
कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर को दिल्ली की अदालत से बड़ी राहत मिली है। 2017 के भ्रष्टाचार मामले में कोर्ट ने सुकेश को रिहा करने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा कि जिस अपराध में अधिकतम सात साल की सजा हो सकती है, उसमें आरोपी पहले ही इससे ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। ऐसे में मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक उसे इस मामले में जेल में रखना सही नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने सुकेश की रिहाई का आदेश दिया है।
हालांकि, ताजा आदेश से यह संभव नहीं कि सुकेश चंद्रशेखर सभी मामलों में जेल से बाहर आ जाएगा। अदालत ने अपने आदेश में साफ किया है कि उसे तभी रिहा किया जाए, जब वह किसी दूसरे मामले में वांछित न हो।
राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) विद्या प्रकाश ने 28 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अदालत के इस आदेश से सुकेश को 2017 के भ्रष्टाचार मामले में बड़ी राहत मिली है।
अदालत के सामने सुकेश चंद्रशेखर की ओर से दलील दी गई थी कि वह इस मामले में तय अधिकतम सजा से भी ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। रिकॉर्ड के मुताबिक, सुकेश को 24 अक्टूबर 2017 को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था।
पैरोल और अंतरिम जमानत पर बाहर रहने की अवधि हटाने के बाद भी वह कुल आठ साल, नौ महीने और 14 दिन जेल में रह चुका है। जबकि उसके खिलाफ जिन धाराओं में आरोप हैं, उनमें अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान है।
सुकेश पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) की धारा 12 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120B के तहत आरोप लगाए गए हैं। यह मामला दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दर्ज किया था।
इस बीच, सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत में सुकेश की रिहाई का विरोध किया। सरकारी पक्ष का कहना था कि उसके खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों में 29 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के तहत दर्ज मामले भी शामिल हैं।
अभियोजन पक्ष ने आशंका जताई कि जेल से बाहर आने पर सुकेश गवाहों को प्रभावित कर सकता है। यह भी दलील दी गई कि 21 सितंबर 2022 को सीआरपीसी की धारा 436A के तहत जमानत मिलने के बावजूद उसने जमानतदार पेश नहीं किए थे। इसलिए उसे अपनी ही गलती का फायदा नहीं मिलना चाहिए।
अदालत ने अभियोजन पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि सीआरपीसी की धारा 436A के दूसरे प्रावधान का पालन करना जरूरी है। इस प्रावधान के मुताबिक, किसी भी आरोपी को उस अपराध के लिए तय अधिकतम जेल की सजा से ज्यादा समय तक जांच, पूछताछ या मुकदमे के दौरान हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाया, जिससे यह साबित हो कि मुकदमे में देरी सुकेश की वजह से हुई है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आदेश दिया कि मुकदमे की सुनवाई जारी रहने के दौरान सुकेश को इस मामले में हिरासत में नहीं रखा जाए।