
El Niño 2026: दुनिया भर में मौसम के बदलते मिजाज के बीच अल नीनो (El Niño) का प्रभाव चिंता बढ़ा रहा है। इसके कारण विश्व के कई हिस्सों में भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ और तूफानों का खतरा भी बढ़ रहा है। इसी बीच क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के एक पूर्वानुमान में हैरान करने वाली बात सामने आई है। इसके मुताबिक, अगले छह महीनों में अल नीनो से जुड़ी अतिरिक्त गर्मी के कारण पूरी दुनिया में 3.73 लाख से अधिक लोगों की मौत हो सकती है। इस अनुमान में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है।
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब ने 'अल नीनो हीट मॉर्टैलिटी ट्रैकर' जारी किया गया है। इसके मुताबिक, अक्टूबर से मार्च तक भारत में गर्मी से जुड़ी करीब 55 हजार अतिरिक्त मौतें हो सकती है। इनमें से अधिकांश मौतें मार्च में होने की आशंका जताई गई है।
हालांकि, ये आंकड़े पूर्वानुमान पर आधारित हैं। वहीं भारत के अलावा नाइजीरिया में भी गर्मी से होने वाली मौतों का बड़ा खतरा बताया गया है। यहां इस अवधि में लगभग 56 हजार अतिरिक्त मौतों का अनुमान जताया गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अल नीनो के कारण पड़ने वाली भीषण गर्मी का सबसे अधिक असर ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के कई देश भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के पुर्वानुमान के अनुसार, इंडोनेशिया में गर्मी से जुड़ी करीब 29 हजार अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जबकि ब्राजील में यह आंकड़ा लगभग 19 हजार हो सकता है।
इस पर विशेषज्ञों की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा कि कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं, अत्यधिक गर्मी के प्रति संवेदनशील आबादी और सीमित संसाधनों के कारण विकासशील देशों में इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।
बता दें कि अल नीनो का असर केवल तापमान तक सीमित नहीं रह सकता। मौसम के बदलते पैटर्न का प्रभाव वायु गुणवत्ता पर भी पड़ने की आशंका है।
NDTV ने अपनी एक रिपोर्ट में SAFAR के संस्थापक-परियोजना निदेशक और IISc के NIAS में चेयर प्रोफेसर डॉ. गुफरान बेग के हवाले से लिखा कि मुंबई में वायु प्रदूषण बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि अल नीनो के प्रभाव से बड़े पैमाने पर वायुमंडलीय परिसंचरण और हवाओं की गति धीमी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में मुंबई में प्रदूषकों को फैलने में कठिनाई हो सकती है, जिससे शहर की वायु गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।
वहीं विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अल नीनो के प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक, इस जलवायु घटना के दिसंबर में चरम पर पहुंचने की आशंका है। इसके कारण दुनिया के बड़े हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है।
इससे कुछ क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है, जबकि अन्य इलाकों में बाढ़ जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। अल नीनो का प्रभाव 2027 की शुरुआत तक जारी रहने की आशंका भी जताई गई है।
बता दें कि अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने की जलवायु घटना है। इसके कारण दुनिया भर में हवाओं, वायुदाब और बारिश के पैटर्न में बदलाव आता है।
इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखाई देता है। कहीं सूखे और लू का खतरा बढ़ता है, तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
अल नीनो की घटना आमतौर पर हर दो से सात साल में होती है और करीब नौ से 12 महीने तक बनी रह सकती है। इसके विपरीत स्थिति को ला नीना (La Niña) कहा जाता है, जबकि इनके बीच की अवस्था को तटस्थ स्थिति माना जाता है।