
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन तमाम लोगों की याचिकाओं पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जो 2024 के बड़े फैसले के बावजूद अपने घरों पर बुलडोजर चलाए जाने की शिकायत लेकर पहुंचे थे।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में तथ्यों की जांच जरूरी है, इसलिए पीड़ितों को इस मामले में अपने-अपने हाईकोर्ट में जाना चाहिए। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए बड़ा झटका है, जिन्हें उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में खुद दखल देगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 'बुलडोजर जस्टिस' पर ब्रेक लगाते हुए साफ-साफ कहा था कि किसी को सिर्फ आरोप लगने या अपराधी मानकर उसका घर-दुकान तोड़ना गलत है।
कोर्ट ने इसको लेकर सख्त गाइडलाइंस दी थीं, लेकिन ग्राउंड पर हालात बदलते नजर नहीं आए। कई राज्यों में अभी भी बिना पूरी प्रक्रिया के तोड़-फोड़ की खबरें आती रहीं।
इसी को लेकर अब कई याचिकाएं दाखिल हुईं, जिसमें आरोप लगाया गया कि कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जोयमलया बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि हर मामले में अलग-अलग तथ्य हैं। कहीं अतिक्रमण का मुद्दा है, कहीं नोटिस की बहस है, तो कहीं और कुछ। इतने सारे फैक्चुअल सवालों को सुप्रीम कोर्ट में नहीं निपटाया जा सकता।
CJI सूर्य कांत ने कहा कि 2024 का फैसला सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण को छोड़कर बाकी मामलों पर लागू होता है, लेकिन हर बार इसे उल्लंघन में नहीं देखा जा सकता।
बेंच का मानना था कि हाईकोर्ट स्थानीय स्तर पर बेहतर जांच कर सकते हैं, गवाहों को बुला सकते हैं और फैक्ट फाइंडिंग कर सकते हैं। इससे पीड़ितों को जल्द राहत भी मिल सकती है।
उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि बुलडोजर सिर्फ सजा का हथियार नहीं बन सकता। हर तोड़-फोड़ से पहले 15 दिन का नोटिस, फिर सुनवाई, डिजिटल रिकॉर्ड और वीडियोग्राफी जरूरी है। उल्लंघन पर कंटेम्प और मुआवजा का भी प्रावधान है। इस फैसले ने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी कि कानून का राज बुलडोजर से ऊपर है या नहीं।