
कुछ ही दिनों पहले केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ एक पोस्ट डाला था, जिसको लेकर जमकर विवाद हुआ था। हालांकि, पोस्ट अपलोड करने के कुछ घंटे बाद उसे डिलीट कर दिया गया।
अब इस मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई हुई। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही के दौरान शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि देश में संविधान से ऊपर कोई नहीं है। न कोई व्यक्ति, न कोई संस्था और न ही कोई राजनीतिक संगठन।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि संविधान की ओर से देश के नागरिकों को दी गई गारंटी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक संयम को उसकी कमजोरी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। अदालत की गरिमा और अधिकार को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। इसके सामने हर व्यक्ति और संस्था बराबर है। किसी भी राजनीतिक दल या प्रभावशाली व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने की कोशिश करे।
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की आजादी लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। यह किसी सरकार, राजनीतिक दल या व्यक्ति की कृपा पर निर्भर नहीं करती। इसका आधार संविधान और कानून का शासन है।
शीर्ष अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायपालिका की गरिमा के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि उसके फैसलों की आलोचना की जा सकती है। आलोचना कितनी भी कड़ी क्यों न हो, यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल अदालत को डराने, दबाव बनाने या न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसे न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने या उसकी निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने कड़े अंदाज में यह भी कहा कि अदालतों का संयम उनकी कमजोरी नहीं है। न्यायपालिका कई बार संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए संयम बरतती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अदालत के अधिकार को चुनौती देने की छूट मिल जाएगी।
अदालत ने कहा कि उसकी प्रतिष्ठा किसी राजनीतिक दल के समर्थन या मंजूरी पर निर्भर नहीं है। उसकी ताकत संविधान और कानून के शासन से आती है। इसलिए अदालत की सत्ता और अधिकार को कमजोर करने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर न्याय प्रशासन में दखल देने की बात साबित होती है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। इस मामले में किसी व्यक्ति की पहचान, राजनीतिक पहुंच या प्रभाव को आधार बनाकर अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।