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Rural Inflation in India: आधी कमाई रसोई में, जेब खाली और कर्ज भारी! ग्रामीण भारत की बदहाली पर जयराम रमेश ने मोदी सरकार को घेरा

Rajasthan Patrika Rural India Report: ग्रामीण परिवारों की कमाई का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों में खर्च हो रहा है। बचत और कर्ज के आंकड़ों ने आर्थिक दबाव की नई बहस छेड़ दी है। जयराम रमेश ने इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरते हुए आगामी चुनावों का जिक्र किया है।
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भारत

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Manoj Vashisth

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Updated: 6 Nov 2026, 2:29 PM IST

Jairam Ramesh on Modi Government

Rural Inflation in India: थाली छोटी, कर्ज बड़ा और बचत गायब! ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आंकड़ों से मोदी सरकार पर सियासी प्रहार (फोटो सोर्स: ANI)

Jairam Ramesh on Modi Government: गांवों में खुशहाली और आय बढ़ने के सरकारी दावे खूब सुनने को मिलते हैं, लेकिन जब असलियत को जांचते हैं, तो तस्वीर उतनी अच्छी नहीं दिखती। हाल ही में सामने आए आंकड़ों से पता चलता है कि गांवों के परिवारों के लिए घरेलू बजट संभालना मुश्किल होता जा रहा है। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ खाना-पीना जैसे जरूरी कामों में ही खर्च हो जाता है। बचत के नाम पर उनके पास बहुत कम बचता है।

Rural Inflation in India: जयराम रमेश ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए

राजस्थान पत्रिका की एक रिपोर्ट पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने X पर साफ कहा गांवों में लगातार बढ़ती महंगाई और कर्ज का बोझ आम लोगों की हालत कमजोर बना रहा है। उनकी नजर में लोगों की आमदनी पूरी तरह जरूरी जरूरतों में ही खत्म हो जाती है, इसलिए बचत और आगे की जिंदगी का सवाल अधर में लटका रहता है।

रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण परिवार अपनी कुल आमदनी का करीब 53.5% हिस्सा सिर्फ खाने-पीने पर खर्च करते हैं। ऊपर से उन्हें स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई पर भी अच्छी-खासी रकम डालनी पड़ती है। चिंता बढ़ाने वाली बात तो ये है कि गांवों में बहुत से परिवार अनौपचारिक कर्ज पर सालाना करीब 18.3% का ऊंचा ब्याज चुकाते हैं। जब कमाई का बड़ा हिस्सा बुनियादी खर्चों में डूब जाता है, तब कोई बीमारी आ जाए या बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना पड़े, तो कर्ज लेना मजबूरी बन जाता है।

NABARD Rural Financial Survey: महंगाई का दबाव सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं

जयराम रमेश ने खुलकर सरकार की नीतियों की आलोचना की उनका कहना है कि सरकार जमीनी सच्चाई से आंखें मूंदे हुए है और हर मंच पर बस अपनी उपलब्धियों के गुणगान में लगी है।

महंगाई का असर सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है। खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों का असर शहरों में भी उतना ही महसूस होता है। सब्जियों, दालों, दूध, तेल, आटे जैसे सामान की महंगाई ने तो सबसे पहले घरेलू बजट पर चोट की है। जब इनकी कीमत बढ़ती है, लोग बाकी खर्चों में कटौती करने पर मजबूर हो जाते हैं।

हाल की रिपोर्ट्स में अक्टूबर के लिए खुदरा महंगाई दर 5.93% रहने की संभावना जताई गई है, जो सितंबर में 5.54% थी। यानी हालात सुधरने के बजाए और मुश्किल होते जा रहे हैं। चिकित्सा और रोजमर्रा के जरूरी सामान की बढ़ती कीमतें भी आम आदमी की परेशानी बढ़ा रही हैं। अगर खर्च कमाई से तेज बढ़ता रहा, तो मिडिल क्लास और गरीब घरों के लिए आगे की राह और कठिन होगी।

चुनावों में महंगाई बनेगा बड़ा मुद्दा?

सवाल है ये मुद्दा चुनावी जंग में कितना असर डालेगा? जयराम रमेश का कहना है कि पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों में महंगाई बड़ा मुद्दा बनेगा, और लोग इसके लिए सत्ताधारी पार्टी को जवाब देंगे। उन्होंने साफ कहा-अब वक्त आ गया है कि लोग महंगाई और अपनी आर्थिक परेशानियों को ध्यान में रखकर वोट करें।

साफ है, कांग्रेस के आरोप राजनीतिक हैं। सरकार की नीतियां वाकई जमीन पर कैसी असर डाल रही हैं, इसका सही आकलन सरकारी आंकड़ों और दूसरी रिपोर्ट्स मिलाकर करने पर ही हो पाएगा। अभी के लिए इतना तय है कि गांवों में बचत, कर्ज और बुनियादी खर्च की दिक्कतों पर बहस तेज हो गई है। आने वाले वक्त में यह हकीकत चुनावों में कितना असर डालेगी, ये लोगों की जरूरतों और प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।