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मंदिर हो या दरगाह, नियम सबके लिए जरूरी, संविधान की सीमा से ऊपर कोई परंपरा नहीं: सुप्रीम कोर्ट

केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इन मामलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है।
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Apr 29, 2026
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सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: ANI)

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि उसके संचालन के लिए कोई ढांचा न हो और प्रबंधन को लेकर अराजकता की स्थिति नहीं हो सकती। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की पीठ ने यह टिप्पणी केरल के सबरीमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की है।

मंदिर हो या दरगाह सभी के लिए नियम जरूरी

सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा- चाहे मंदिर हो या दरगाह, हर संस्थान के लिए एक नियामक ढांचे की आवश्यकता होती है।

किसी न किसी को उसे विनियमित करना ही होगा। प्रबंधन को व्यक्तिगत इच्छाओं पर नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई कहे कि मैं जो चाहूं वही करूंगा या गेट बिना किसी नियंत्रण के हर समय खुले रहेंगे। इसलिए सवाल यह है कि वह निकाय कौन सा है, जो प्रबंधन करता है। यहीं पर सुरक्षा की बात आती है, क्योंकि विनियमन आवश्यक है।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि नियम जरूरी हैं, लेकिन ऐसा प्रबंधन संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता और न ही संवैधानिक मानदंडों के आधार पर भेदभाव कर सकता है। यह चर्चा एडवोकेट निजाम पाशा की दलीलों के दौरान शुरू हुई, जो हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़ी चिश्ती निजामी वंशावली के प्रत्यक्ष वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। पाशा ने तर्क दिया कि सूफी विश्वास प्रणाली, विशेष रूप से चिश्तिया आदेश, एक विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय है।

एडवोकेट निजाम पाशा ने रेखांकित किया कि भारत में सूफी परंपरा संतों के मजार के प्रति गहरी श्रद्धा रखती है और रोजा, नमाज, हज, जकात और आस्था जैसे प्रमुख इस्लामी अभ्यासों के पालन पर जोर देती है। पाशा ने तर्क दिया कि धार्मिक संस्थान में प्रवेश को विनियमित करने का अधिकार प्रबंधन का हिस्सा है। इसी बिंदु पर कोर्ट ने व्यक्तिगत निर्णयों के बजाय औपचारिक मानदंडों की आवश्यकता पर अपनी टिप्पणी की। सबरीमाला मामले से उत्पन्न कानून के व्यापक सवालों के समाधान के लिए इस नौ जजों की पीठ का गठन किया गया था।

कोर्ट ने वकील को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय को अप्रासंगिक और विषय से बाहर की दलीलें देने पर कड़ी फटकार लगाई। पीठ ने उन्हें कई बार निर्देश दिया कि वे अपने तर्क केवल विचाराधीन मुद्दों तक सीमित रखें। उपाध्याय ने संस्कृत और अंग्रेजी भाषा की तुलना करते हुए कहा कि अंग्रेजी में संविधान और धर्म जैसे शब्दों का सटीक अनुवाद संभव नहीं है। इस पर जस्टिस महादेवन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वकील विषय से भटक रहे हैं और उन्हें केवल मुद्दे पर ही अपनी दलीलें रखनी चाहिए। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने भी उन्हें भाषा संबंधी बहस से बचने को कहा।

Updated on:
29 Apr 2026 05:48 am
Published on:
29 Apr 2026 05:48 am