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धार्मिक मामलों में महिला अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा- महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश करने पर प्रतिबंध नहीं है

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मंदिर (Sabarimala Temple) सहित विभिन्न धार्मिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों पर सुनवाई हुई। इस दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law) ने स्पष्ट किया कि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं है।

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भारत

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Vinay Shakya

Apr 25, 2026

supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

केरल के चर्चित सबरीमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक मामलों में महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इन मामलों की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच में गुरुवार को मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के अधिकार संबंधी मुद्दे पर दलीलें दी गई। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने पक्ष रखा।

महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश करने पर प्रतिबंध नहीं

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिवक्ता एमआर शमशाद ने पक्ष रखा। अधिवक्ता एमआर शमशाद ने कोर्ट में कहा- महिलाओं को नमाज अदा करने के लिए मस्जिदों में प्रवेश करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इस याचिका में मुस्लिम महिलाओं ने मस्जिद में प्रवेश करने और अग्रिम पंक्ति में खड़ा करने की अनुमति की मांग की थी।

कोर्ट में हुई बहस का कुछ अंश

  • एडवोकेट शमशाद: मस्जिद में 'पवित्रस्थल' की कोई अवधारणा नहीं है तो किसी विशेष स्थान पर खड़े होने या नमाज का नेतृत्व करने पर कोई जोर नहीं दे सकता, दरगाहों में पवित्र स्थल होता है।
  • CJI सूर्यकांत: क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?
  • एडवोकेट शमशाद: इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर सर्वसम्मति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लेकिन, इस पर भी सर्वसम्मति है कि नमाज अदा करने वालों में महिलाओं का होना अनिवार्य नहीं है।
  • जस्टिस अहसान अमानुल्लाह: आपको यह स्पष्ट करना चाहिए कि शुरू से ही महिलाओं के मस्जिद प्रवेश पर विवाद नहीं है, यह पैगम्बर मोहम्मद से शुरू हुआ था।
  • एडवोकेट शमशाद: जी हां, स्वयं पैगंबर ने कहा है कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको। लेकिन, महिलाओं के लिए उचित यही है कि वे घर पर रहकर प्रार्थना करें। इससे उन्हें उतना ही धार्मिक फल मिलता है।
  • CJI सूर्यकांत: क्या इसका मतलब यह है कि महिलाएं सभा में शामिल नहीं हो सकती?
  • एडवोकेट शमशाद: यदि वे मस्जिद जा रही हैं तो यह जायज है।
  • जस्टिस बीवी नागरत्ना: क्या महिलाओं के लिए मस्जिद की नमाज में शामिल होना अनिवार्य नहीं है?
  • जस्टिस अमानुल्लाह: क्या महिलाओं को मस्जिद में जाने से रोके जाने का कारण यह था कि अगर घर के सभी लोग चले जाते हैं, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?
  • एडवोकेट शमशाद: महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की मांग पर आपत्ति नहीं है, लेकिन मस्जिद में प्रवेश करने के बाद वहां के आंतरिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इस्लाम के संदर्भ में अनिवार्य धार्मिक प्रथा के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया है। इस्माइल फारूकी मामले के अदालती फैसले में मस्जिद को इस्लाम के लिए इस आधार पर आवश्यक नहीं माना गया, क्योंकि नमाज खुले में भी अदा की जा सकती है। सभी प्रथाएं मस्जिद से जुड़ी हुई हैं। फिर हम अनुच्छेद 25 का क्या करेंगे। एक सिख सेना में दाढ़ी रख सकता है तो मुसलमान इसी वजह से बर्खास्त क्यों?
  • CJI सूर्यकांत: हम इस बहस में नहीं जाएंगे कि सिख धर्म में पुरुष के लिए दाढ़ी रखना 5 अनिवार्य सिद्धांतों में शामिल है।