Temple Employees Minimum Wage: सुप्रीम कोर्ट में एक PIL पर सुनवाई संभव है जिसमें सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों और कर्मचारियों के लिए उचित वेतन और सेवा शर्तें तय करने हेतु आयोग बनाने की मांग की गई है।
Supreme Court Temple Priests Salary: सुप्रीम कोर्ट आज (सोमवार) को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर सकता है, जिसमें सरकार-नियंत्रित मंदिरों में कार्यरत पुजारियों, सेवादारों और अन्य मंदिर कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है। यह याचिका एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर की गई है, जिस पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ विचार कर सकती है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब किसी मंदिर का प्रशासन और वित्तीय नियंत्रण राज्य सरकार के अधीन होता है, तो वहां कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों को कर्मचारी माना जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने वेतन संहिता, 2019 की धारा 2(के) का हवाला दिया है। याचिका में कहा गया है कि ऐसे मामलों में मालिक और कर्मचारी के बीच औपचारिक संबंध बनता है, इसलिए इन कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन मिलना उनका कानूनी और संवैधानिक अधिकार है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को पर्याप्त वेतन न मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि सम्मानजनक जीवन जीने के लिए उचित वेतन देना आवश्यक है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारें नीति निर्देशक सिद्धांतों, विशेषकर अनुच्छेद 43 के अनुरूप कार्य करने में विफल रही हैं, जो सभी श्रमिकों के लिए जीवन यापन योग्य वेतन सुनिश्चित करने की बात करता है।
अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि इस मुद्दे की शुरुआत 4 अप्रैल को हुई, जब वे वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर गए थे। वहां उन्हें यह जानकारी मिली कि सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों को न्यूनतम जीवनयापन योग्य वेतन भी नहीं मिलता। इसी अनुभव ने उन्हें इस विषय पर व्यापक जनहित याचिका दाखिल करने के लिए प्रेरित किया।
याचिका में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का भी जिक्र किया गया है, जहां हाल ही में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। इन राज्यों में कार्यरत कई कर्मचारियों को कथित रूप से अकुशल या अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान किए जाने का आरोप लगाया गया है।
याचिका में 7 फरवरी 2025 की एक घटना का उल्लेख किया गया है, जिसमें तमिलनाडु के मदुरै स्थित दंडायुथपाणि स्वामी मंदिर में एक सर्कुलर जारी कर पुजारियों को आरती की थाली में दक्षिणा लेने से रोका गया था। हालांकि बाद में विरोध के चलते यह आदेश वापस ले लिया गया, लेकिन इस घटना ने पुजारियों की आर्थिक स्थिति और आजीविका को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।