
Supreme Court Polygamy Case: देश में मुस्लिम समुदाय के भीतर सदियों से चली आ रही बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा पर अब कानूनी शिकंजा कसने लगा है। शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की सह-संस्थापक जाकिया सोमन द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है।
यह याचिका केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि देश की लाखों महिलाओं के मानवाधिकारों और समानता के अधिकार की मांग है। याचिका में तर्क दिया गया है कि संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और अनुच्छेद 21 (सम्मान से जीने का अधिकार) हर नागरिक को समान सुरक्षा की गारंटी देता है।
अदालत में दायर याचिका केवल बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें महिलाओं के पुनरुत्थान के लिए व्यावहारिक कदम उठाने की मांग भी की गई है:
बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध: मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) अधिनियम, 1937 के तहत मिलने वाली बहुविवाह की छूट को समाप्त कर इसे अन्य धर्मों की तरह गैर-कानूनी घोषित किया जाए।
आर्थिक सहायता की गारंटी: जब तक इस प्रथा पर पूरी तरह रोक नहीं लग जाती, तब तक पीड़ित और छोड़ दी गई महिलाओं को मासिक गुजारा भत्ता (Maintenance) और वित्तीय मदद मिले।
अनिवार्य मैरिज रजिस्ट्रेशन: देश में सभी मुस्लिम निकाहों का कानूनी पंजीकरण अनिवार्य किया जाए ताकि महिलाओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा हो सके।
"यह लड़ाई किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और कानूनी बराबरी के लिए है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाली असीमित छूट के कारण महिलाओं और बच्चों को सामाजिक व आर्थिक बेदखली झेलनी पड़ती है।" जाकिया सोमन, याचिकाकर्ता