
दिल्ली में सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इन पर सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि किसी भी विरोध-प्रदर्शन समूह को किसी निर्धारित स्थल पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रदर्शन स्थलों का इस्तेमाल एक निश्चित अवधि के लिए ही होना चाहिए, ताकि अन्य समूहों को भी अपनी मांगों और मुद्दों को उठाने का अवसर मिल सके।
याचिकाओं पर सुनवाई कहते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी एक समूह को हमेशा के लिए किसी प्रदर्शन स्थल पर कब्जा करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक समूह लगातार किसी जगह पर प्रदर्शन करता रहेगा, तो दूसरे प्रदर्शनकारी कहां जाएंगे?
CJI ने कहा कि आप किसी प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकते। वहां दूसरे प्रदर्शनकारियों को भी आने का अधिकार है। किसान, मजदूर, ट्रेड यूनियन और बेघर लोग कहां जाएंगे? हर किसी को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है।
मामले में सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार संविधान से मान्यता प्राप्त है, लेकिन व्यापार और रोजगार के जरिए आजीविका कमाने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पीठ ने सुनवाई के दौरान विशेष रूप से दिहाड़ी मजदूरों की परेशानियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के कारण यदि कामकाज प्रभावित होता है, तो रोज कमाकर अपना पेट पालने वाले लोगों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाता है।
CJI ने कहा कि इस मामले में अलग-अलग पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। एक तरफ लोगों को अपनी मांग उठाने का अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिकों और कामगारों की रोजी-रोटी भी प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि किसी एक समूह को प्रदर्शन स्थल पर कब्जा होने के आधार पर दूसरे समूहों को वहां प्रदर्शन करने से रोकने का अधिकार नहीं मिल जाता।
अदालत ने कहा कि प्रशासन को यह भी देखना होगा कि किसी प्रदर्शन को आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त समय क्यों नहीं दिया जा रहा है और अन्य समूहों को कब अवसर मिलेगा।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां डटे रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की।
मेहता ने कहा कि संसद केवल एक राजनीतिक इमारत नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता का प्रतीक है। बिना आधिकारिक अनुमति के संसद या सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
उन्होंने कहा कि निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर शांतिपूर्ण विरोध करना एक अलग बात है, लेकिन बिना अनुमति लाखों लोगों को संसद की ओर मार्च करने के लिए बुलाना अलग मामला है।
याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान व्यापारियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेश हुए। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शनों के कारण कारोबार को करीब 2 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली में रामलीला मैदान प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल है, लेकिन इसके आसपास असफ अली रोड, दरियागंज, तुर्कमान गेट, कमला मार्केट और जामा मस्जिद जैसे बड़े व्यापारिक क्षेत्र स्थित हैं।
रोहतगी के अनुसार, इन इलाकों में बड़ी आबादी रहती है और यहां थोक बाजारों के साथ लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार को दिल्ली के साथ-साथ अन्य राज्यों की राजधानियों के लिए भी प्रदर्शन स्थलों को लेकर एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
उन्होंने त्योहारों के मौसम में कारोबार प्रभावित होने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस दौरान बिक्री नहीं होने से व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इसका असर केवल दुकानदारों पर नहीं, बल्कि मजदूरों, लोडरों, टेम्पो चालकों और अन्य सहायक कामगारों पर भी पड़ता है।
व्यापारियों के नुकसान के दावे पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सवाल किया कि क्या कारोबार में गिरावट के लिए केवल प्रदर्शनकारियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
उन्होंने कहा कि कई बार प्रशासन भी सड़कों पर बैरिकेडिंग करता है और दुकानों को बंद रखने के निर्देश देता है। ऐसे में यह भी देखना होगा कि कारोबार प्रभावित होने के पीछे सरकारी प्रतिबंधों की कितनी भूमिका है।
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कई बार प्रदर्शनकारी खुद दुकानों को बंद कराने के लिए मजबूर करते हैं और कुछ स्थितियों में प्रदर्शन हिंसक भी हो जाते हैं।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि रामलीला मैदान पहले से ही प्रदर्शन के लिए अधिसूचित स्थल है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जंतर-मंतर से प्रदर्शन स्थल को स्थानांतरित किया गया और अब रामलीला मैदान को लेकर भी आपत्ति जताई जा रही है, तो आखिर लोग अपनी बात रखने के लिए कहां जाएं?