राष्ट्रीय

शरीयत कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सीजेआइ सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र से मांगा जवाब

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने यूसीसी को संवैधानिक लक्ष्य बताते हुए मुस्लिम उत्तराधिकार कानून में भेदभाव के मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और मामले को अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ा है।

2 min read
Apr 17, 2026
Feature image
सुप्रीम कोर्ट (ANI)

भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर बहस लंबे समय से जारी है। यह मुद्दा अलग अलग धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों और समानता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यूसीसी एक संवैधानिक लक्ष्य है और इसका किसी धर्म से सीधा संबंध नहीं है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब मांगा है।

सीजेआइ सूर्यकांत की अध्यक्षता में सुनवाई

इस मामले की सुनवाई सीजेआइ सूर्यकांत (CJI Surya Kant), जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने की थी। बेंच ने स्पष्ट किया कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान कानून लागू करना है। कोर्ट ने कहा कि यह किसी एक धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूत करने का प्रयास है। पीठ ने यह भी माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगते हुए इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और इसे अन्य समान मामलों के साथ जोड़ दिया है।

उत्तराधिकार जैसे मुद्दे धार्मिक नहीं बल्कि सिविल - याचिकाकर्ता

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि उत्तराधिकार जैसे मुद्दे धार्मिक नहीं बल्कि सिविल प्रकृति के हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति में पुरुषों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलता है, जो स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून पूरी तरह कोडिफाइड नहीं है और इसके नियम इतने जटिल हैं कि कई बार वकीलों के लिए भी इन्हें समझना मुश्किल हो जाता है। यह स्थिति न्याय तक पहुंच को भी प्रभावित करती है।

भेदभावपूर्ण प्रथा समाप्त हो - कोर्ट

सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि विरासत कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। इसके अलावा यह भी बताया गया कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है, जिससे उसके अधिकार सीमित हो जाते हैं। कोर्ट ने इस पर कहा कि यदि कोई प्रथा अपने स्वभाव में भेदभावपूर्ण है तो उसे समाप्त किया जा सकता है। हालांकि, यह भी सवाल उठाया गया कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय अदालत का होगा या विधायिका यह फैसला लेगी।

Published on:
17 Apr 2026 08:03 am
Also Read
View All
रांची में RSS दफ्तर पर अटैक, 3 आरोपी गिरफ्तार, VHP ने पुलिस से कहा- तुरंत नाम बताओ

राज्यसभा चुनाव: झारखंड में NDA समर्थित उम्मीदवार परिमल नथवानी जीते, JMM से बैद्यनाथ राम ने मारी बाजी

BJP Leader Murder Case: भाजपा नेता, उनके चचेरे भाई समेत 3 लोगों की एक साथ उठी अर्थी, गांव में चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा

15 करोड़ यूजर्स के अधिकार कैसे छीन सकते हैं? नीट री-एग्जाम के पहले टेलीग्राम बैन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने किया सवाल

Telegram Ban Case Hearing: टेलीग्राम के वकील ने कहा-‘लीक हुआ पेपर असली नहीं था,मामले की सही जांच नहीं की गई’, जज ने पूछा-आपको कैसे पता ? अदालत ने फैसला सुर​क्षित रखा