राष्ट्रीय

चिदंबरम नटराज मंदिर का प्रबंधन नहीं संभाल पाएगी सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम नटराज मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। फिलहाल मंदिर का प्रशासन दीक्षितरों के पास ही रहेगा।
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Updated: 4 Nov 2026, 4:37 PM IST
Supreme Court
चिदंबरम नटराज मंदिर। (फोटो- ANI)

तमिलनाडु के प्रसिद्ध चिदंबरम नटराज मंदिर पर राज फिलहाल दीक्षितरों के पास ही रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए पांच सदस्यीय बोर्ड बनाने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने मंदिर में कथित अनियमितताओं, निर्माण में बदलाव और संपत्तियों के रिकॉर्ड की जांच के लिए यह फैसला सुनाया था।

राज्य सरकार को भेजा नोटिस

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने बुधवार को दीक्षितरों की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के 30 अक्टूबर के फैसले पर रोक लगा दी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तमिलनाडु सरकार को नोटिस भी जारी किया है।

दीक्षितरों की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सवाल उठाया। बेंच ने पूछा कि क्या ऐसा कोई ठोस सबूत है, जिससे यह साबित होता हो कि मंदिर की इमारतों में किए गए बदलावों के लिए दीक्षितर जिम्मेदार हैं?

दीक्षितरों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि हाईकोर्ट ने मूल विवाद से आगे बढ़कर मंदिर का पूरा प्रशासन अपने हाथ में लेने का आदेश दे दिया। उन्होंने दलील दी कि मंदिर के प्रबंधन से दीक्षितरों को हटाने का फैसला उचित नहीं है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई जानी चाहिए। इसके साथ ही पांच सदस्यीय बोर्ड के गठन और मंदिर का प्रशासन संभालने से जुड़े आदेश पर फिलहाल रोक लग गई।

हाईकोर्ट ने क्यों दिया था मंदिर का प्रबंधन संभालने का आदेश?

मद्रास हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर को अपने फैसले में मंदिर के प्रशासन को लेकर कई सवाल उठाए थे। कोर्ट के मुताबिक, मंदिर में आधुनिक निर्माण कार्यों से उसके कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा मंदिर के खातों और संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच जरूरी है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पांच सदस्यीय बोर्ड को तत्काल मंदिर का प्रशासन संभालने का निर्देश दिया था। इस बोर्ड में हाईकोर्ट के दो रिटायर्ड जज, एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी, पोथु दीक्षितरों के सचिव और राज्य के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के सचिव को शामिल किया जाना था।

बोर्ड को दर्शन की व्यवस्था, मंदिर के पैसों की निगरानी और मंदिर की संपत्तियों को वापस हासिल करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी। हालांकि, रोजाना की पूजा और धार्मिक उत्सवों का काम दीक्षितरों के पास ही रहना था।

कनक सभा में दर्शन को लेकर शुरू हुआ था विवाद

दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत मई 2022 में हुई थी। उस समय तमिलनाडु सरकार ने श्रद्धालुओं को मंदिर की कनक सभा से दर्शन करने की अनुमति दी थी। यह मंदिर के भीतर बना एक ऊंचा मंच है, जहां परंपरागत रूप से विशेष पूजा होती है।

मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले वंशानुगत पुजारियों यानी दीक्षितरों ने सरकार के इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि सरकार का फैसला संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत मिले धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकार में दखल है।

हाईकोर्ट ने हालांकि सरकार के आदेश को सही ठहराया था। कोर्ट का मानना था कि कनक सभा से श्रद्धालुओं को दर्शन की अनुमति देने से धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

Updated on:
4 Nov 2026, 4:37 PM IST
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