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CJP Protest: दिल्ली प्रदर्शन पर देश की नजर! नेताओं की रिहाई से मेट्रो सेवाओं तक, आज सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई ?

Supreme Court Contempt Petition: क्या विरोध प्रदर्शन रोकने के नाम पर आम लोगों की आवाजाही सीमित की जा सकती है? क्या एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई न्यायिक कसौटी पर खरी उतरती है? इन सवालों के जवाब से दिल्ली में प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहस को नई दिशा मिल सकती है।
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Oct 11, 2026
Supreme Court Sunday Hearing
Supreme Court Sunday Hearing: रविवार को सुप्रीम कोर्ट में महा-सुनवाई (फोटो सोर्स: ANI)

Supreme Court Sunday Hearing: दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक परिवहन पर लगी पाबंदियों और विपक्षी नेताओं की हिरासत का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के सामने है। रविवार को होने वाली विशेष सुनवाई में यह सवाल अहम रहेगा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन कितनी दूर तक जा सकता है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। मेट्रो सेवाओं में व्यवधान, पुलिस कार्रवाई और न्यायालय के पूर्व निर्देशों के पालन को लेकर दायर याचिकाओं पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

Delhi Protest: मेट्रो बंदी पर अवमानना की मांग, नेताओं की रिहाई का सवाल भी अदालत में

रविवार की इस विशेष सुनवाई के केंद्र में दो अलग-अलग याचिकाएं हैं, लेकिन दोनों का संबंध प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिक स्वतंत्रता से है। एक याचिका में अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है, जबकि दूसरी में हिरासत में लिए गए राजनीतिक नेताओं और अन्य लोगों की रिहाई का अनुरोध किया गया है।

9 अक्टूबर के आदेश के पालन पर सवाल

अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर अवमानना याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) की अध्यक्ष डी थारा को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के बावजूद मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध और रेल सेवाओं में कटौती जारी रही। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही निकलेगा।

दरअसल, 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में मेट्रो के 57 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद करने तथा कई ट्रेनों को रद्द करने की योजना सामने आई थी। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह ठप नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने सेवाओं को नियंत्रित तरीके से संचालित करने और यात्रियों को समय रहते जानकारी देने पर जोर दिया था।

विपक्षी नेताओं की हिरासत पर भी सुनवाई

दूसरी याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी की ओर से दायर की गई है। इसमें विपक्षी नेताओं की एहतियाती हिरासत को चुनौती दी गई है। याचिका में चार पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कई राजनीतिक हस्तियों की गिरफ्तारी या हिरासत की वैधता पर सवाल उठाते हुए उन्हें अदालत के समक्ष पेश करने और रिहाई के निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिका में यह भी चिंता जताई गई है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लेने की कार्रवाई हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत सहित वकीलों के साथ कथित पुलिस ज्यादती का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को सीमित करने के लिए एहतियाती हिरासत का मनमाना इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

मौलिक अधिकार बनाम कानून-व्यवस्था

संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है। हालांकि, ये अधिकार कानून के अनुरूप उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं। इसी तरह, एहतियाती हिरासत के मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

अब अदालत के सामने चुनौती यह तय करने की है कि सुरक्षा संबंधी कदमों और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन कैसे कायम रहे। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ रविवार को इन मामलों पर सुनवाई करेगी।


Updated on:
11 Oct 2026 08:15 am
Published on:
11 Oct 2026 07:55 am