
Madras High Court order: मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु भर में सड़कों, मार्गों और बस्तियों के नामों में इस्तेमाल हो रहे जातिसूचक शब्दों को हटाने के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की है।
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जज जी अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें अब तक हटाए गए और अभी शेष जातिसूचक नामों का विवरण देना होगा।
यह स्वत: संज्ञान याचिका न्यायमूर्ति एन. रमेश द्वारा 11 अगस्त 2026 को पारित आदेश के आधार पर दर्ज की गई थी। अपने पहले न्यायिक आदेश में उन्होंने इस बात पर चिंता जताई थी कि अनेक न्यायिक निर्देशों और सरकारी आदेशों के बावजूद जातिसूचक नाम अब भी प्रचलन में हैं।
नामक्कल जिले के सेन्दामंगलम थाने में दर्ज एक प्राथमिकी में किसी स्थान का उल्लेख 'पल्लर स्ट्रीट' के रूप में किए जाने पर न्यायाधीश ने सवाल उठाया था कि 1978 से जारी सरकारी निर्देशों और बाद के न्यायालयीय आदेशों के बावजूद ऐसी नामावली कैसे बनी हुई है।
अदालत ने कहा था कि किसी सड़क या इलाके का नाम जाति के आधार पर होने से वहां रहने वाले लोग भी उसी जातिगत पहचान से पहचाने जाने लगते हैं।
यही नाम राशन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस सहित विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हो जाते हैं, जिससे सामाजिक प्रभाव और गहरा हो जाता है।
जस्टिस एन. रमेश ने संविधान के जातिविहीन समाज के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा था कि हाल ही में जज डी. भरत चक्रवर्ती ने राज्य के सभी स्कूलों और कॉलेजों के नामों से भी जातिसूचक शब्द हटाने का निर्देश दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा आदि द्रविड़ कल्याण विभाग का नाम बदलकर सामाजिक न्याय विभाग किए जाने जैसी पहल तब तक अधूरी रहेगी, जब तक सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के नामों से भी जातिसूचक पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं कर दी जाती।
अब हाईकोर्ट इस पूरे मामले की निगरानी करेगा और राज्य सरकार से अपेक्षित कार्रवाई की विस्तृत जानकारी मांगी है। इससे राज्य में सार्वजनिक स्थानों के नामों से जातिगत पहचान हटाने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है।