
Tibet Flood News: तिब्बत में ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ में मरने वालों की संख्या को लेकर चीन ने अब तक कोई ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। आईएएनएस की खबर के मुताबिक एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह चुप्पी कोई संयोग नहीं, बल्कि तिब्बतियों की पीड़ा को दबाने की चीन की पुरानी नीति का हिस्सा है। इस जानबूझकर बरती गई गोपनीयता के जरिए बीजिंग अंतरराष्ट्रीय निगरानी और घरेलू सहानुभूति, दोनों से बचने की कोशिश कर रहा है।
तिब्बत में आई इस बाढ़ ने पूरे इलाकों को तबाह कर दिया और कई परिवार बिखर गए। ऐसी आपदा के बाद किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है कि वह नागरिकों को हादसे की असली गंभीरता से अवगत कराए। लेकिन ताइवान के अखबार 'ताइपे टाइम्स' में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने हताहतों की जानकारी न देकर तिब्बती लोगों की जिंदगियों को महज आंकड़ों तक सीमित कर दिया और उनके दुख को सार्वजनिक रिकॉर्ड से मिटा दिया।
14वें दलाई लामा के भतीजे खेद्रुप थोंडुप ने ताइपे टाइम्स में लिखे अपने लेख में चीनी अधिकारियों की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि तिब्बत में जब भी तिब्बती समुदाय को असमान रूप से नुकसान झेलना पड़ता है, चाहे वह विद्रोह हो, आत्मदाह की घटनाएं हों या फिर पर्यावरणीय आपदाएं, चीनी प्रशासन का रुख हमेशा सच्चाई का सामना करने के बजाय उसे दबाने का रहा है। थोंडुप के मुताबिक, तिब्बती मौतों की खबरों को दबाकर चीन न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय जांच से बच निकलता है, बल्कि यह स्वीकार करने से भी बचता है कि तिब्बती समुदाय एक अलग, मजबूत और लचीली पहचान रखता है, जिसे चीनी सत्ता मिटाना चाहती है। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन और बेतरतीब विकास से पहले ही कमजोर हो चुका तिब्बत का पारिस्थितिकी तंत्र आने वाले समय में और बड़े संकटों का संकेत दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि चीन की चुप्पी सिर्फ आंकड़े छिपाने की नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों को छिपाने की कोशिश है।
यह विनाशकारी बाढ़ 26 अगस्त को चीन के तिब्बत क्षेत्र से शुरू हुई थी और सीमा पार बहने वाली भोटे कोशी नदी के जरिए नेपाल के रसुवा जिले तक पहुंच गई। इस बाढ़ ने हिमालयी देश नेपाल में भारी तबाही मचाई और सैकड़ों लोगों की जान ले ली।
अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने भी चीन पर इस आपदा से जुड़ी जानकारी को दबाने और सख्त सेंसरशिप लागू करने का आरोप लगाया है। संगठन के मुताबिक, चीन में सरकारी निगरानी में चलने वाले सोशल मीडिया मंच वीबो पर 'ग्यिरोंग भूस्खलन आपदा के पीड़ितों को श्रद्धांजलि' नाम से एक हैशटैग को जानबूझकर ट्रेंडिंग सूची में सबसे ऊपर रखा गया, साथ ही आपदा से जुड़े आठ अन्य हैशटैग भी प्रमुखता से दिखाए गए।
HRW के मुताबिक, इस ट्रेंडिंग टॉपिक में सबसे ऊपर मौजूद पोस्ट में सरकारी चैनल सीसीटीवी की एक एंकर पोलित ब्यूरो का बयान पढ़ते हुए दिखाई दीं, जिसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कथित तौर पर देश के शीर्ष नेताओं से पीड़ितों के लिए एक मिनट का मौन रखने को कहा। संगठन ने कहा कि इन ट्रेंडिंग पोस्ट में पीड़ितों की अपनी आवाज लगभग गायब है और पूरा फोकस मृतकों की संख्या, बचाव अभियान और हादसे की तकनीकी वजहों पर केंद्रित रखा गया। रिपोर्टों का हवाला देते हुए HRW ने बताया कि पत्रकारों को आपदा प्रभावित इलाके में जाने और पीड़ित परिवारों से बातचीत करने से रोका गया है, जिससे वे पूरी तरह सरकारी बयानों पर निर्भर हो गए हैं। संगठन का यह भी दावा है कि आपदा से जुड़ी 'अफवाहें फैलाने' के आरोप में चीनी प्रशासन ने कम से कम 10 लोगों को सजा दी है।
HRW के अनुसार, चीनी सरकारी मीडिया ने भूस्खलन की संभावित वजहें दिखाने के लिए AI से बनाई गई तस्वीरों और वीडियो का सहारा लिया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मीडिया का हवाला देते हुए संगठन ने बताया कि चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट पर बाढ़ के पानी में लोगों को जान बचाकर भागते हुए दिखाने वाला असली फुटेज दुनियाभर में प्रसारित हुआ, लेकिन चीन के भीतर इस फुटेज को सेंसर कर दिया गया।