
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को कहा कि देश के ट्रिब्यूनल (Tribunal) अब न्यायपालिका (Judiciary) के लिए बोझ और सरकार के लिए भी सिरदर्द बन चुके हैं। सीजेआई सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि ज़्यादातर ट्रिब्यूनल 'नो मैन्स लैंड' बन चुके हैं और किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, जो राष्ट्रीय हित के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है।
सीजेआई ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि ट्रिब्यूनल केंद्र सरकार ने बनाए, इसलिए यह उसका दायित्व है। अदालत ने कार्यप्रणाली में गंभीर खामियों पर चिंता जताते हुए 4 सप्ताह में एक समान प्रस्ताव लाने के पहले दिए गए निर्देश की याद दिलाई और कहा कि इन संस्थाओं को निष्क्रिय नहीं होने दिया जा सकता। टीडीसैट में अध्यक्ष न रहने पर तकनीकी सदस्य के काम संभालने का जिक्र करते हुए जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि तकनीकी सदस्य अकेले आदेश पारित नहीं कर सकता। सीजेआई ने एक तकनीकी सदस्य पर फैसले आउटसोर्स करने का आरोप उजागर कर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि सदस्यों की विशेषज्ञता और जवाबदेही पर पुनर्विचार जरूरी है और नए तंत्र की ज़रूरत है। नवंबर 2025 में तत्कालीन सीजेआई बी.आर. गवई (B.R. Gavai) की बेंच ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम, 2021 की नियुक्ति और कार्यकाल संबंधी धाराएं रद्द कर दी थीं और केंद्र सरकार को 4 महीने में राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग गठित करने का निर्देश दिया था, जिससे नियुक्ति, प्रशासन और कार्यप्रणाली में स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित हो सके।