राष्ट्रीय

जिस दिन ईरान ने अमेरिका को दिया था सबसे बड़ा जख्म, उसी दिन ट्रंप को मिली मध्यावधि चुनाव में बड़ी हार

4 नवंबर 1979 को ईरान ने 52 अमेरिकियों को बंधक बनाया था, आज उसी दिन ट्रंप की पार्टी मध्यावधि चुनाव हारी। जानें ईरान पर हमले की तैयारी की रिपोर्ट।
4 min read
• •
Updated: 4 Nov 2026, 1:12 PM IST
Donald Trump news
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फोटो-- ANI)

आज अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के नतीजे आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेंजेटेटिव में करारी शिकस्त हुई है। डेमोक्रेट्स पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस में बहुमत हासिल कर ली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ईरान युद्ध मिड टर्म इलेक्शन में मुख्य मुद्दा रहा है। आज यानी 4 नवंबर की तारीख अमेरिकी इतिहास के लिए महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि 4 नवंबर 1979 को अमेरिकी दूतावास पर कब्जे के बाद 52 अमेरिकी बंधक 444 दिनों तक रखे गए थे।

खुमैनी ने डाली ईरान में इस्लामिक रीजिम की नींव

ईरान के राजा शाह मोहम्मद रजा पहलवी अमेरिकी समर्थक थे। उनके शासनकाल में ईरानी तेल का कारोबार पूरी तरह से पश्चिमी दुनिया खासकर ब्रिटेन और अमेरिका के हाथों में था। जब ईरान में अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में जनवरी 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई तो रजा शाह ईरान छोड़कर भाग गए। फरवरी में आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी 14 साल के निर्वासन से वापस लौटे और ईरान में इस्लामिक रीजिम की नींव पड़ी। इसी दौरान रजा शाह पहलवी ने अमेरिका में शरण ली। इस पर ईरान के पहले सुप्रीम लीड खुमैनी भड़क गए और उन्होंने अमेरिका को बड़ा शैतान बताया।

अमेरिकी नागरिकों के गलों में जूतों की माला पहनाया

4 नवंबर 1979 की सुबह 500 से अधिक छात्रों ने ईरान की राजधानी तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास को घेर लिया। छात्रों की भीड़ दूतावास के अंदर घुस गई। उन्होंने गेट तोड़े और दूतावास के बाहर तैनात मरीन कमांडो को काबू किया, फिर परिसर में मौजूद 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया। उन्होंने उन अमेरिकी नागरिकों के गलों में जूतों की माला पहनाया और उन्हें बाहर लेकर आए।खुमैनी ने छात्रों की इस हरकत को दूसरी क्रांति करार दिया। कुछ दिनों बाद ईरानी रीजिम ने कुल 14 बंधकों को रिहा किया। बाकी के 52 अमेरिकी नागरिक ईरानी रीजिम के कैद में रहे।

1980 में रिहा हुए बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिक

बंधकों की रिहाई को लेकर कूटनीतिक दवाब डाले गए। 14 नवंबर 1979 को अमेरिका ने ईरानी संपत्तियों को फ्रीज कर दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बंधकों की रिहाई की मांग की, लेकिन ईरानी शासन ने अमेरिकी मांग को नजरअंदाज कर दिया। फिर अमेरिका ने गुप्त सैन्य अभियान की योजना बनाई। अप्रैल 1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ लॉन्च किया गया, लेकिन यह मिशन फेल हो गया। फिर साल 1980 में अल्जीरिया की मध्यस्थता में दोनों देशों की बीच एक डील हुई। अमेरिका ने ईरानी संपत्ति (करीब 8 बिलियन डॉलर) अनफ्रीज की और प्रतिबंध हटाए। 20 जनवरी 1981 को यानी कि ठीक रीगन के शपथ ग्रहण के कुछ देर बाद 52 बंधकों को रिहा कर दिया गया।

अभी क्या है ईरान-अमेरिका के बीच स्थिति

दोनों देशों के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। 28 फरवरी को अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। ईरान ने इसके जवाब में मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी रणनीतिक व सामरिक अड्डों को नुकसान पहुंचाया। ईरानी सेना यहीं नहीं रुकी, उसने अमेरिकी सहयोगी देशों जैसे कि कतर, सऊदी अरब और दुबई के आर्थिक ढांचों को निशाना बनाया। जिनसे उन्हें काफी नुकसान पहुंचा। जून के महीने में पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता के बाद ईरान और अमेरिका ने शांति समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, लेकिन वह भी जल्द ही टूट गया। इसके बाद दोनों ही देश एक दूसरे के पर हमलावर हैं।

कई रिपोर्टों में यह दावा- अमेरिका जल्द कर सकता है ईरान पर बड़ा हमला

अब खबर सामने आ रही है कि अमेरिका जल्द ही ईरान पर बड़ा हमला कर सकता है। अमेरिकी और विदेशी मीडिया में ऐसी कई रिपोर्टें भी सामने आई है। WSJ और न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि डोनाल्ड ट्रंप व उनके सेक्रेटरी ईरान पर 8 से 10 दिनों की आक्रामक हमले की प्लानिंग में जुटे हैं। हालांकि, इस पर अभी तक मुहर नहीं लगी है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के बेहद खास माने जाने वाले इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू लगातार उन पर ईरान पर भीषण हमला शुरू करने का दवाब बना रहे हैं।

मोसाद का दावा- ईरान ने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम शुरू कर दिया है

इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का दावा है कि ईरान की इस्लामिक रीजिम ने एकबार फिर से यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम शुरू कर दिया है। ईरान के पिकैक्स माउंटेन की गुफाओं में ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। कभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक रहे टकर कार्लसन ने कहा कि मोसाद जिस जगह पर परमाणु कार्यक्रम चलाए जाने का दावा कर रहा है, वह 300 फुट मोटी ठोस ग्रेनाइट चट्टान के नीचे है। उन सुरंगों को नष्ट करने की क्षमता अमेरिका के किसी भी पारंपरिक हथियार में नहीं। जहां कथित तौर पर परमाणु संवर्धन हो रहा है। लिहाजा, ऐसे में एकमात्र सैन्य विकल्प परमाणु हमला ही बचता है। नेतन्याहू इसके लिए लगातार जोर लगा रहे हैं। वह रोजाना ट्रंप को फोन करते हैं।

अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन ने कहा कि नेतन्याहू घिर चुके हैं और बेचैन हैं। पिछले हफ्ते के चुनाव नतीजों के बाद वे तब तक सरकार नहीं बना सकते, जब तक ट्रंप सीधे इजरायली राजनीति में दखल देकर दूसरे दलों से ऐसा समझौता न करा दें, जिससे नेतन्याहू को नेसेट में 61 सीटें मिल जाएं। ऐसा न हुआ तो वे प्रधानमंत्री पद से बाहर होंगे और उन्हें बदनामी, जांच और संभवतः जेल का सामना करना पड़ेगा।

संभावित अमेरिकी-इजरायली कार्रवाई से खौफ में खाड़ी के देश

पश्चिम एशिया में अमेरिका के बाकी पुराने सहयोगी और युद्ध की आशंका से डरे हुए हैं। 27 सितंबर को नेतन्याहू गुपचुप तरीके से अबू धाबी गए, ताकि ईरान पर अंतिम हमले की मुहिम में यूएई को साथ ला सकें। अमीरात ने इनकार कर दिया। आठ महीने के संघर्ष के बाद खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाएं डगमगा रही हैं, और वैश्विक ऊर्जा व उर्वरक बाजार भी। ये जल्दी संभलने वाले नहीं हैं।

Updated on:
4 Nov 2026, 1:12 PM IST
Published on: