
Delhi Air Pollution : पटाखों से पहले ही दिल्ली का दम घुटा! हवा में कैंसरकारी कणों का कहर, अब दिवाली की चिंता (फोटो सोर्स: ANI)
Delhi Air Pollution: देश की राजधानी में दिवाली की खुशियों से पहले ही सांसों पर संकट गहराने लगा है। आसमान में छाई धुंध अब सिर्फ मौसम का मिजाज नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सेहत के लिए गंभीर चेतावनी बन चुकी है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि हवा में मौजूद खतरनाक प्रदूषकों का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर पहुंच गया है। सवाल यह है कि आखिर दिल्ली की हवा को जहरीला बनाने में सबसे बड़ी भूमिका किसकी है?
राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण ने बुधवार को खतरनाक रूप धारण कर लिया। शहर के कुछ इलाकों में पीएम2.5 का स्तर 461 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक दर्ज किया गया। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 24 घंटे की अनुशंसित सीमा 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 30 गुना से भी ज्यादा है। प्रदूषण निगरानी संस्था IQAir के आंकड़ों ने राजधानी की बिगड़ती हवा की गंभीर तस्वीर सामने रखी है।
दिवाली से पहले हालात चिंताजनक हो गए हैं। रविवार को होने वाले दीपोत्सव के दौरान आतिशबाजी से प्रदूषण बढ़ने की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने कम उत्सर्जन वाले तथाकथित ग्रीन पटाखों के सीमित इस्तेमाल की अनुमति दी है, लेकिन नियमों का पालन कराना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। दिल्ली में पहले भी प्रतिबंधों के बावजूद पटाखों की आवाज और धुएं का असर देखने को मिलता रहा है।
दिल्ली की सर्दियों में अगर हम प्रदूषण की बात करें, तो इसका पूरा दोष सिर्फ गाड़ियों के धुएं को नहीं दिया जा सकता। पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि शहर में ठंड के दिनों में जितना प्रदूषण होता है, उसमें वाहनों की हिस्सेदारी करीब 23% है। खेतों में पराली और जैविक कचरा जलाने से करीब 20% प्रदूषण आता है, और उद्योगों या कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों का योगदान करीब 9% है।
असल में ज्यादातर प्रदूषण सीधे किसी एक जगह से नहीं निकलता। लगभग 27% प्रदूषण उन द्वितीयक कणों से बनता है, जो तब पैदा होते हैं जब वाहनों, उद्योगों, बिजलीघर और खेतों से निकली गैसें आपस में मिलकर हवा में रासायनिक तरीके से रिएक्ट करती हैं।
हवा में जहर घोलने के पीछे खाद का भी बड़ा हाथ है। द नाइट्रोजन बॉम्ब किताब के लेखक और द हिंदू के विज्ञान संपादक जैकब कोशी ने इस पर खास जोर दिया है। उनके मुताबिक, जो अमोनिया खेतों में डाली गई खाद से निकलती है, वही हवा में मौजूद दूसरे प्रदूषकों से मिलकर खतरनाक कण बना रही है।
तो साफ है, दिल्ली की हवा सुधारनी है, तो सिर्फ ट्रैफिक या पराली के धुएं को काबू करना काफी नहीं है। खेतों में हो रही केमिकल रिएक्शन और बाकी वजहों को समझना भी जरूरी है।
ये प्रदूषण सिर्फ आंखों में जलन या गले में खराश तक सीमित नहीं है। पीएम2.5 जैसे छोटे कण फेफड़ों को पार कर ब्लड सर्कुलेशन तक पहुंच जाते हैं। ज्यादा समय तक इनके असर में रहने से बड़ी स्वास्थ्य दिक्कतें पैदा होती हैं।
द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में 2024 में छपे एक स्टडी के मुताबिक भारत में 2009 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण से करीब 38 लाख लोगों की जान गई।
दिल्ली में प्रशासन ट्रैफिक और कंस्ट्रक्शन पर रोक तो लगा रहा है, लेकिन त्योहार, मौसम और इतने सारे प्रदूषण स्रोत—इन सबका मिलाजुला असर इस चैलेंज को और कठिन बना देता है।
Updated on:
4 Nov 2026, 3:19 PM IST
Published on:
4 Nov 2026, 3:04 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.