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श्मशान घाट में नवविवाहित करते हैं पूजा, जानिए एक दिन के लिए गांव की सीमा से बाहर चले जाते हैं ग्रामीण?

अजब-गजब परंपराएं: नागौर का बासनी में अनोखी मान्यता…बिना दहेज शादी, बारातियों के लिए सिर्फ चाय… अधिक जानने के लिए नीचे पढ़ें रोचक खबर।

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Feb 22, 2026
अजब-गजब परंपराएं: श्मशान घाट में पूजा करता हुआ नवविवाहित जोड़ा और दूसरी तरफ अंतिम संस्कार। एक प्रतीकात्मक AI जनरेटेड फोटो (सोर्स: चैट-GPT)

Unique Tradition: हमारी सदियों पुरानी मान्यताओं और परंपराओं ने सामाजिक एकजुटता और भाईचारे को मजबूत किया है। इन परंपराओं में हमें पुरखों की जीवन शैली और उनके रीति-रिवाज का पता चलता है। ऐसी विस्मयकारी परंपराओं में मध्यप्रदेश में हरदा जिले के कनारदा की है। कनारदा में सत्तू अमावस्या पर त्रिसाला (तीन साल में) का आयोजन होता है। इस दिन गांव के सभी लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक गांव के बाहर ही पूरा समय पूजन, भजन-कीर्तन में बिताते हैं। सभी लोग गांव की सुरक्षा, खुशहाली और सुख-समृद्धि के लिए देवी-देवताओं का पूजन करते हैं। खास यह है कि इस दिन 24 घंटों के लिए गांव के किसी भी घर में ताला नहीं लगता। गांव के नितिन जोशी ने बताया, बीच में कुछ युवकों ने गैर जरूरी बताते हुए इसका पूजन नहीं किया, तब आगजनी की घटनाएं हुईं।

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बैतूल का चूडिय़ां गांव : गांव में नहीं बेचे जाते दुग्ध उत्पाद

बैतूल. चिचोली ब्लॉक के तहत ग्राम चूडिय़ां में करीब १५० वर्ष से अनोखी परंपरा चली आ रही है। ग्रामीण कभी भी दूध, दही और मठा नहीं बेचते, बल्कि नि:शुल्क ही बांट देते हैं। ग्रामीण हरि यादव, गोविंद महाराज ने बताया कि परंपरा की शुरुआत गांव के ही संत चिन्ध्या साधु के वचन से हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि इनका व्यवसाय नहीं करेंगे तो खुशहाली रहेगी। कुछ लोगों ने दूध का व्यापार शुरू करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।

रेगिस्तान की अनूठी परंपरा: खेत और जोहड़ के नाम बने पहचान

सूरतगढ़. शहरों और गांवों का नामकरण तो आम बात है, लेकिन सूरतगढ़ तहसील के टिब्बा क्षेत्र में खेतों, जोहड़ों और उनके पायतनों तक के नाम पीढिय़ों से प्रचलित हैं। पानी की कमी वाले इस इलाके में वर्षा जल संचयन के लिए खोदे गए जोहड़ों का नाम अक्सर उन्हें बनाने वाले व्यक्ति के नाम पर रखा जाता है। जैसे पलकानियां, गोगाणियां और केसर आदि।

नागौर का बासनी : बिना दहेज शादी, बारातियों के लिए सिर्फ चाय

बासनी. नागौर के बासनी बेलीमा कस्बे में वर्षों से बिना दहेज शादियों का रिवाज है। कौमी सोसायटी संस्था के सदर हाजीहबीबुर्रहमान कालूवाले ने बताया कि बेटा-बेटी का निकाह किसी गरीब परिवार को बोझ नहीं लगे, इसलिए इस परम्परा की शुरुआत की गई थी। कई परिवार बारात को भी एक कप चाय या शर्बत पिलाकर विदा करते हैं। अन्य खर्चों पर भी फिजूल खर्च रोककर बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं।

जैसलमेर का बड़ा बाग: श्मशान स्थल में नवविवाहित करते हैं पूजा

जैसलमेर. जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर स्थित बड़ा बाग क्षेत्र में नवविवाहित जोड़ों के लिए यहां आकर पूजा-अर्चना करना जरूरी माना जाता है। यहां पूर्व राजघराने की 103 छतरियां स्थित हैं, जो राजघराने का श्मशान स्थल होने के साथ-साथ गहरी आस्था और मान्यताओं का केंद्र भी हैं। मान्यता है कि पूर्व राजघराने के स्वर्गवासी महारावल और महारानियों का आशीर्वाद नवविवाहित जोड़े व उनके परिवार पर बना रहता है।

नंदौरी में 81 साल से चल रही ‘राम कोठी’ परंपरा: साहूकारों से बचाने की मिसाल

भिलाई. छत्तीसगढ़ के ग्राम नंदौरी में किसानों को साहूकारों के कर्ज से बचाने के लिए 1945 में ‘अन्नपूर्णा भंडार’ या ‘राम कोठी’ की परंपरा शुरू की गई थी। छेरछेरा पर्व पर बुजुर्ग घर-घर जाकर धान एकत्र करते हैं और इसे जरूरतमंद किसानों को बेहद कम ब्याज पर उधार दिया जाता है। इस राशि से स्कूल के कमरे, पुस्तकालय, सांस्कृतिक भवन, कुआं, नाली और कच्चा मार्ग बनवाया जाता है। गरीबों की आर्थिक मदद भी की जाती है।

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Published on:
22 Feb 2026 05:23 am
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