
उत्तराखंड के केदारनाथ और हर्सिल के बाद नेपाल की त्रासदी का पैटर्न लगभग एक जैसा था। यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन के असर से हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बन रही सैकड़ों ग्लेशियल झीलें कभी भी तबाही ला सकती हैं। हिमालय में खतरे की सबसे बड़ी वजह ग्लेशियरों का पीछे हटना और उसकी जगह नई झीलों का बनना है। चिंता इसलिए बड़ी है, क्योंकि तीन दशक में हिमालय में ऐसी झीलों की संख्या 83% बढ़ गई। 1990 से 2020 के बीच हिमालय क्षेत्र में 0.01 किलोमीटर से बड़ी 2406 झीलें थीं, जो 2020 में बढकऱ 4420 हो गईं। भारतीय हिमालय की 0.05 वर्ग किलोमीटर से बड़ी 329 ग्लेशियल झीलों के वैज्ञानिक अध्ययन में ऐसी झीलों के क्षेत्रफल में 15.84% की वृद्धि पाई गई।
चिंता की बात यह है कि ये बदलाव पूरे हिमालय में एक जैसे नहीं हुए। नई झीलों का निर्माण और पुरानी झीलों का फैलाव खास तौर पर नेपाल, भूटान, सिक्किम और एवरेस्ट क्षेत्र में ज़्यादा देखा गया है। यही इलाके कई बड़ी नदियों के उद्गम क्षेत्र भी हैं, जिनका पानी आगे चलकर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है।
इन झीलों को रोकने वाले बांध बर्फ, चट्टानों और मलबे से बने होते हैं। ऐसे में इस बात की आशंका हमेशा रहती है कि तेज़ बारिश, भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा झील में गिरने से पानी तेज़ी से नीचे की ओर जाएगा। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लोफ कहा जाता है। इसे 'वॉटर बम' कहना भी गलत नहीं होगा।
दुनिया में करीब 1.5 करोड़ लोग संभावित ग्लोफ के प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं। इनमें भारत की हिस्सेदारी करीब 30 लाख है। हालांकि 30 लाख का मतलब यह नहीं है कि इन सभी लोगों पर तत्काल बाढ़ का खतरा है। यह उन लोगों की संभावित आबादी है, जो किसी ग्लेशियल झील के टूटने पर बनने वाली बाढ़ के अनुमानित प्रभाव क्षेत्र में रहते हैं। यानी हिमालय की ऊंचाई पर बनी एक झील का खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है। उसका असर नीचे बसे गांवों, कस्बों, शहरों और नदी घाटियों तक पहुंच सकता है।
अगर किसी झील का बांध टूटा तो पानी के साथ चट्टान और मलबे का सैलाब तेजी से नीचे की घाटियों में उतर सकता है। इसका असर बस्तियों के साथ सडक़, पुल और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है।
हिमालयी खतरे का एक बड़ा हिस्सा उत्तराखंड से जुड़ा है। राज्य में करीब 426 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई हैं। इनमें सभी झीलें खतरनाक नहीं हैं, लेकिन बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ इनके आकार और स्थिरता पर लगातार नज़र रखने की ज़रूरत बढ़ गई है।