
सुप्रीम कोर्ट (Photo - ANI)
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की जस्टिस बीवी नागरत्ना (B. V. Nagarathna) ने शनिवार को कहा कि केंद्रीय और राज्य स्तर की बार काउंसिलों को पेशेवर नैतिकता, सदाचार और पेशेवर दक्षता को बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जब कोई बार काउंसिल अपने सदस्यों का सम्मान अर्जित नहीं करती है, तो यह वकालत पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
जस्टिस नागरत्ना ने दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह (Bar Council में संबोधन दिया और इस विषय पर भी बात कही। उनकी टिप्पणियों को हाल ही में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। मिश्रा ने सीजेआई सूर्यकांत के विरोध के मुद्दे पर नाल्सार हैदराबाद के विधि छात्रों का बीसीआई में पंजीयन रोकने के निर्देश दिए थे जो बाद में वापस ले लिए गए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारत में बार एसोसिएशन को एकजुट होकर यह बताना होगा कि लंबित मामलों में देरी और बढ़ती लागत के हालात में देश में न्याय व्यवस्था को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है। बार की स्वतंत्रता वकीलों को उनके व्यक्तिगत फायदे के लिए दिया गया विशेषाधिकार नहीं है बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों के समूह की ज़रूरत होती है जो सरकार, बाजार और अपने मुवक्किलों को सलाह दे सकें, मुद्दों पर बहस कर सकें, चुनौती दे सकें और लोगों के अधिकारों का प्रतिनिधित्व कर सकें।
जस्टिस नागरत्ना ने वकीलों से आग्रह किया कि वो अपनी मानसिकता बदलें और अपने मुवक्किलों के लिए सार्वजनिक सेवा के रूप में काम करने के लिए दृढ़ रहें जो इस पेशे में बहुत ही ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट की इस बात को हल्के में लेकर ऐसा नहीं करने पर आने वाले समय में ये वकील अपनी प्रासंगिकता खोने का खतरा रखता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि वकालत का पेशा कोई व्यापार नहीं है, बल्कि विश्वास का एक पद है और इसे ऐसे व्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता जो प्रति घंटे के हिसाब से कानूनी ज्ञान बेचता हो।
Updated on:
30 Aug 2026 02:10 am
Published on:
30 Aug 2026 02:09 am
