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पश्चिम बंगाल SIR: लंबित अपीलों वाले मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट में नाम पर हटने या जुड़ने से संबंधित लंबित अपीलों वाले मतदाताओं को विधानसभा चुनाव में वोट डालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। बंगाल में 23 व 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे।
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Apr 14, 2026
supreme Court
सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में एसआइआर प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट में नाम पर हटने या जुड़ने से संबंधित लंबित अपीलों वाले मतदाताओं को विधानसभा चुनाव में वोट डालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपीलों के फैसले होने पर मतदान के दिन तक पूरक वोटर लिस्ट जारी करने ने निर्देश देने पर विचार किया जा सकता है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने से वंचित लोगों की याचिका पर सुनवाई की मंशा जाहिर की है। बता दें कि पश्चचिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए 23 एवं 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। CJI ने कहा कि वोट देने की अनुमति की अंतरिम राहत देना संभव नहीं है, क्योंकि इससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होगी। याचिकाकर्ताओं को अपना केस न्यायाधिकरण के सामने रखना चाहिए।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कल्याण बनर्जी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने जन प्रतिनिधित्व कानून धारा 21(3) के प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि यदि एसआइआर प्रक्रिया चल रही है, तो चुनाव के लिए पिछली मतदाता सूची का उपयोग किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि ट्रिब्युनल में अपील लंबित रहने के दौरान इस पर निर्णय नहीं हो सकता।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने चिंता जताई कि चुनाव में जीत का अंतर 2% और SIR में लंबित अपीलों के कारण वंचित मतदाओं की संख्या 15% हो तो यह सोचने की बात है। उन्होंने अपीलों पर विचार करने के लिए एक मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया।

जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग द्वारा बिहार में अपनाई गई प्रक्रिया से विचलन कर बंगाल में अलग प्रक्रि्या पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बिहार में कहा गया था कि 2002 की मतदाता सूची में नाम होने पर कोई दस्तावेज नहीं देने होंगे जबकि बंगाल में दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। इस पर आयोग के वकील दामा शेषाद्री नायडू ने कहा कि ऐसे लोगों से दस्तावेज नहीं बल्कि सिर्फ यह प्रमाण मांगा जा रहा है कि क्या वे वही व्यक्ति हैं। जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां मतदान का अधिकार न केवल संवैधानिक है बल्कि भावनात्मक भी है।

Updated on:
14 Apr 2026 06:18 am
Published on:
14 Apr 2026 06:18 am