पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य व भाजपा नेता प्रो. गौरव वल्लभ ने कहा कि देश का अगले साल का बजट (2026-27) ऐसे समय में आ रहा है जब भारत एक अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। आर्थिक विकास दर विश्व में अग्रणी बनी हुई है, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ऐतिहासिक स्तर पर है […]
पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य व भाजपा नेता प्रो. गौरव वल्लभ ने कहा कि देश का अगले साल का बजट (2026-27) ऐसे समय में आ रहा है जब भारत एक अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। आर्थिक विकास दर विश्व में अग्रणी बनी हुई है, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ऐतिहासिक स्तर पर है और डिजिटल प्रणालियों ने शासन की कार्यप्रणाली को रूपांतरित कर दिया है। आने वाले बजट में चुनौती विकास की इस गति को दीर्घकालिक समृद्धि में बदलने की है।
इसके लिए तीन प्रमुख स्तंभों का समन्वय आवश्यक है, कल्याण वितरण, निजी निवेश और एमएसएमई का विस्तार। यही तीनों मिलकर एक एक-दूसरे को सशक्त करते हैं और टिकाऊ विकास चक्र की नींव रखते हैं। सुविचारित कल्याण, कौशल और क्रय शक्ति बढ़ाता है। बढ़ती मांग और बेहतर अवसंरचना निजी निवेश को प्रोत्साहित करती है। सशक्त निवेश एमएसएमई के लिए अवसर पैदा करता है और जीवंत उद्यम रोजगार सृजित कर दीर्घकालिक राजकोषीय दबाव को कम करते हैं।
पिछले एक दशक में भारत ने दुनिया के सबसे व्यापक डिजिटल कल्याण नेटवर्कों में से एक का निर्माण किया है। सहायता की रकम सीधे लाभार्थी के खाते में हस्तांतरण (डीबीटी) से रिसाव कम कर 3.5 लाख करोड़ रुपए की बजत हुई है लेकिन कल्याण का पैटर्न बदलने की जरूरत है। कल्याण के रूप में राज्यों में सब्सिडी, मुफ्त सुविधाओं और आय सहायता पर खर्च से सार्वजनिक वित्त पर दबाव तथा विकास खर्च कम होने का जोखिम बढ़ा है। नए पैटर्न में यदि कल्याण मानव पूंजी, यानी कौशल, स्वास्थ्य और रोजगार-क्षमता, को मजबूत करता है तो यह एक सक्षम कार्यबल और उत्पादक मांग का निर्माण होगा। यहीं से निजी निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा।
हाल के वर्षों में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में तेज वृद्धि से अवसंरचना निर्माण को गति मिली है लेकिन कॉरपोरेट निवेश अब भी सतर्क बना हुआ है, जिसका कारण वैश्विक अनिश्चितता और जोखिम की धारणा है। निजी निवेश की मजबूत भागीदारी के बिना न तो बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन संभव है और न ही तकनीकी उन्नयन। ऐसे में बजट से अपेक्षा है कि वह नीति स्थिरता को सुदृढ़ करे, पूंजी बाजारों को गहराई दे और व्यवसाय करने की लागत को कम करे।
एमएसएमई देश के जीडीपी में करीब 30% का योगदान और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। डिजिटल पंजीकरण, क्रेडिट गारंटी और भुगतान सुधारों से इस क्षेत्र को बल मिला है, परंतु वित्त, अनुपालन और बाजार तक पहुंच जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। सरल नियम, तेज विवाद निपटान और भरोसेमंद ऋण उपलब्धता एमएसएमई को विस्तार और बड़े मूल्य शृंखलाओं से जुड़ने में सहायता कर सकती है। बजट में इस क्षेत्र को मजबूत सहारे की जरूरत है।