लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूक जाने और संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयानों और ऑर्गनाइजर में छपे लेख में पार्टी की कार्यप्रणाली की आलोचना के बाद राजनीतिक गलियारे में घमासान मच गया है। पढ़िए अनंत मिश्रा की विशेष रिपोर्ट...
लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूक जाने और संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयानों और ऑर्गनाइजर में छपे लेख में पार्टी की कार्यप्रणाली की आलोचना के बाद राजनीतिक गलियारे में घमासान मच गया है। इस बीच, संघ परिवार नतीजों को लेकर बड़ा आत्ममंथन करने जा रहा है। भाजपा सहित 36 सहयोगी संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच 31 जुलाई से 3 सितंबर के बीच केरल के पलक्कड़ में होने जा रही राष्ट्रीय समन्वय बैठक में नतीजों की समीक्षा होगी। इस बैठक में भाजपा के अध्यक्ष, संगठन महामंत्री प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे। बैठक में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के बीच समन्वय या अन्य स्तर पर सामने आईं शिकवा-शिकायतें भी दूर होंगी। सभी संगठनों के फीडबैक से सबक लेते हुए भाजपा को आगे की रणनीति पर कार्य करने का सुझाव जारी होगा।
संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से शनिवार को गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भेंट करेंगे। लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद यह भाजपा के किसी नेता की सरसंघचालक से पहली भेंट है। दरअसल, संघ शिक्षा वर्ग की बैठक के सिलसिले में भागवत का गोरखपुर प्रवास है। संघ पदाधिकारियों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी का गृह जनपद होने के कारण यह शिष्टाचार भेंट है।
कहावत है, ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो… ’ लगता है लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा की बंद मुट्ठी खोल दी है। तभी तो उम्मीदों के मुताबिक नतीजे नहीं आने से ‘विचार परिवार’ में ऊपर से लेकर नीचे तक खलबली मची हुई। दावा ‘चार सौ पार’ का था लेकिन ‘तीन सौ’ के भी लाले पड़ गए। ऐसे में सवाल तो खड़ा होना ही था कि, आखिर चूक हुई तो कहां? पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इशारों-इशारों में तीर चलाया। फिर इंद्रेश कुमार ने नतीजों को अहंकार से जोड़ा, तो नागपुर से लेकर दिल्ली तक हलचल मच गई। इंद्रेश कुमार के बयान से संघ ने पल्ला झाड़ लिया। आनन-फानन में मामले को ठंडा करने के प्रयास तेज हो गए। संघ-भाजपा की समन्वय बैठक केरल में होने की जानकारी भी सामने आ गई। लेकिन असली सवाल का जवाब जनता जानना चाहती है। सवाल ये कि भगवत-इंद्रेश के जो बयान आए हैं क्या वे चुनाव से पहले नहीं आने चाहिए थे? अगर संघ को लगता है कि भाजपा के नेता पटरी से उतर रहे हैं तो उसने नतीजों का इंतजार क्यों किया? एक और सवाल, कि अगर नतीजे भाजपा की उम्मीदों के मुताबिक ही आते तो संघ क्या करता? भाजपा और संघ के बीच तीन महीने पहले नागपुर में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बैठक हुई थी। लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से तीन दिन पहले शुरू हुई इस बैठक में तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई होगी। किसको, क्या और कैसे करना है, सब कुछ तय हुआ होगा। फिर खामी कहां रह गई? आमतौर पर संघ-भाजपा के बीच पर्दे के पीछे होने वाली वैचारिक खीचतान की खबरें बाहर नहीं आती है। इस बार जो ध्वनि सुनाई दे रही है उसकी गूंज देर तक और दूर तक सुनाई देने के आसार है।