अपनी अगली पीढ़ी को अपनी संपत्ति देने का क्या तरीका अपनाना चाहिए, ये बता रहे हैं सीए पंकज चांडक...
Will vs Gift Deed Difference in India: अपनी संपत्ति को अगली पीढ़ी को सौंपने का निर्णय केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि एक गंभीर कानूनी और वित्तीय निर्णय है। इसमें सबसे बड़ा अंतर 'अधिकारों के समर्पण' का है। एक विशेषज्ञ के दृष्टिकोण से, इन दोनों के बीच के 'परिवर्तनशील' और 'अपरिवर्तनीय' स्वभाव को समझना अनिवार्य है:
वसीयत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह 'अंतिम इच्छा' है, लेकिन 'अंतिम' तभी होती है जब आप नहीं रहते।
बदलाव संभव: आप अपने जीवनकाल में वसीयत को कितनी भी बार बदल सकते हैं, फाड़ सकते हैं या नई वसीयत बना सकते हैं।
पूर्ण स्वामित्व: जब तक आप जीवित हैं, संपत्ति पर आपका शत-प्रतिशत मालिकाना हक और कब्जा बना रहता है।
भविष्य की सुरक्षा: यदि परिस्थितियों या रिश्तों में बदलाव आता है, तो आप अपनी वसीयत को उसी अनुरूप संशोधित (Revoke or Codicil) कर सकते हैं।
उपहार विलेख एक 'तत्काल और स्थायी' कदम है। एक बार उपहार दे दिया, तो वह पत्थर की लकीर बन जाता है।
बदलाव असंभव: एक बार गिफ्ट डीड पंजीकृत (Registered) हो गई और सामने वाले ने उसे स्वीकार कर लिया, तो आप उसे सामान्यतः वापस (Cancel) नहीं ले सकते। आप चाहकर भी अपना मन नहीं बदल सकते।
स्वामित्व का अंत: गिफ्ट डीड पर हस्ताक्षर करते ही आप उस संपत्ति के मालिक नहीं रहते। अधिकार तत्काल दूसरे के पास चला जाता है।
विवाद से मुक्ति: चूंकि यह आपके जीवित रहते ही पूरा हो जाता है, इसलिए आपकी मृत्यु के बाद इसमें विवाद या कोर्ट-कचहरी की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है।
यदि आप 'अधिकार और सुरक्षा' चाहते हैं कि अंतिम समय तक संपत्ति आपके पास रहे और रिश्तों के हिसाब से आप फैसला बदल सकें, तो 'वसीयत' आपके लिए उत्तम है।
यदि आप 'विवादों का अंत' चाहते हैं और आपको विश्वास है कि आपके जीवनकाल में ही हस्तांतरण सुरक्षित है, तो 'उपहार विलेख' एक सशक्त मार्ग है।
कुल मिलाकर लब्बोलुबाब ये है कि वसीयत 'लचीली' है, जबकि उपहार 'अटल' है। अपनी पारिवारिक स्थिति और संपत्ति के मूल्य के अनुसार ही सही विकल्प चुनें।