राष्ट्रीय

योगी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी तो बढ़ा दी, पर इससे नोएडा की आग ठंडी हो जाएगी क्या?

योगी आदित्य नाथ सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर नोएडा में भड़की आग फिलहाल ठंडी कर दी है, लेकिन यह फिर नहीं भड़के, इस पर सोचने की जरूरत है।

3 min read
Apr 14, 2026
नोएडा में 13 अप्रैल को मजदूरों ने कई गाड़ियां जला दीं।

13 अप्रैल को उत्तर प्रदेश (यूपी) के नोएडा में मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर मजदूर हिंसक हो गए। उन्हें खबर मिली कि उन्हीं की कंपनी में काम करने वाले हरियाणा के मजदूरों की पगार बढ़ गई है, लेकिन उनकी नहीं बढ़ी। दरअसल हरियाणा सरकार ने नौ अप्रैल को न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के आदेश दिए। इसलिए हरियाणा में पड़ने वाले नोएडा के पड़ोस में स्थित फरीदाबाद आदि जगहों पर स्थित कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों की तनख़्वाह बढ़ गई। हिंसा और आगजनी के बाद यूपी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का आदेश जारी कर दिया।

यह हिंसा दो सरकारों की नीतियों के चलते मजदूरी में भेदभाव की वजह से भड़की थी। लेकिन, यह केवल तात्कालिक कारण था और परिणाम भी तात्कालिक था। असल में कारण और परिणाम दोनों ही दूरगामी असर करने वाले हैं।

मजदूरी में भेदभाव की समस्या अकेले यहीं नहीं है। और न ही सरकारों की नीतियों में अंतर इसका एक मात्र कारण है। वेतन देने में लिंग, वर्ग आदि के आधार पर भी भेदभाव देखने को मिलता है।

पुरुष और महिला शिक्षकों के वेतन में दोगुने का अंतर

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफ़एस) 2024 में 21-34 साल के नियमित वेतनभोगी कामगारों का आंकड़ा देखें तो पता चलता है कि प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाने वाली महिला शिक्षकों का वेतन पुरुष शिक्षकों की तुलना में आधा है। प्राइमरी स्कूलों की महिला शिक्षकों का औसत मासिक वेतन जहां 10000 रुपये बताया गया, वहीं पुरुषों के मामले में यह 20000 रुपये था। प्राइमरी से ऊपर, सेकेन्डरी लेवल पर यह अंतर थोड़ा कम (15 और 18 हजार रुपये मासिक) दिखा, लेकिन पढ़ाई से जुड़ी अन्य नौकरियों में दोगुना अंतर पाया गया (महिलाओं का 6000 रुपये और पुरुषों का 12000 रुपये प्रति माह)।

कानून है, फिर भी समान मजदूरी नहीं

इस बारे में कानून होते हुए भी ऐसा हो रहा है। 1976 का समान वेतन कानून में साफ प्रावधान है कि महिला हो या पुरुष, समान काम के लिए समान वेतन देना होगा। फिर भी, ऐसा नहीं हो रहा है। असंगठित क्षेत्र में तो इस कानून की खुले आम धज्जियां उड़ाई जाती हैं। और, हमारे यहां ज़्यादातर लोग असंगठित क्षेत्र में ही काम कर रहे हैं।

कई जगह महिला दिहाड़ी मजदूरों को पुरुष की तुलना में कम पैसे दिए जाते हैं और यह सर्वमान्य व्यवस्था बन चुकी है। बात मजदूरों तक सीमित नहीं है। महिला क्रिकेटर, फिल्म स्टार्स तक मेहनताना दिए जाने में लिंग के आधार पर भेदभाव की बात उठाती रही हैं।

संगठित क्षेत्र में भी समस्या

संगठित क्षेत्र में भी यह समस्या दिखाई देती है। खास कर, निजी कंपनियों में। इसके कई कारण बताए जाते हैं, जैसे- जगह (रहने का खर्च), अनुभव, हुनर, आदि। कुछ मामलों में कारण जायज भी हो सकते हैं, लेकिन कंपनियों की ओर से इस कारण को पाटने की पहल कम ही देखी जाती है। अगर ऐसी पहल हो तो वे कर्मचारियों का असंतोष खत्म कर सकती हैं और उनसे बेहतर नतीजे पा सकती हैं।

दुनिया भर में है समस्या

समान काम के लिए एक जैसा वेतन नहीं देने, खास कर महिलाओं को, की समस्या दुनिया भर में है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुताबिक वैश्विक स्तर पर महिलाओं और पुरुषों के वेतन में करीब 20 फीसदी अंतर पाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूएन) ने भी इस समस्या को गंभीरता से लिया है और इसे खत्म करने के मकसद से हर साल 18 सितंबर को 'इंटरनेशनल इक्वल पे डे' घोषित किया हुआ है।

नोएडा हिंसा को बड़े चश्मे से देखने की जरूरत

नोएडा की हिंसा को बड़े चश्मे से देखने की जरूरत है। यह असमानता दूर नहीं होगी तो यह वर्ग विभेद भी बढ़ाएगा और अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ाने में भी कहीं न कहीं अपना योगदान देता रहेगा। यह खाई बढ़ेगी तो समाज में असंतोष भी बढ़ेगा। अंततः यह पूरे समाज और अर्थव्यवस्था के लिए संकट पैदा करेगा।

Updated on:
14 Apr 2026 12:19 pm
Published on:
14 Apr 2026 12:06 pm
Also Read
View All