
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद मानवीय और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में इलाज करा रहे एक बेघर ब्लड कैंसर मरीज को तुरंत वित्तीय सहायता प्रदान करे। अदालत ने साफ किया है कि मरीज को यह आर्थिक मदद एक हफ्ते के भीतर अस्पताल को जारी की जानी चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार को सख्त हिदायत दी है कि इस प्रक्रिया के लिए मरीज से उन दस्तावेजों की मांग न की जाए, जो उसके पास मौजूद नहीं हैं।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 37 साल के बेसहारा व्यक्ति विक्रांत तिवारी द्वारा दायर एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। दरअसल, विक्रांत 'डिफ्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा' (एक प्रकार का ब्लड कैंसर) से पीड़ित हैं।
अदालत ने याचिकाकर्ता की दयनीय स्थिति का संज्ञान लेते हुए कहा कि वह एक बेघर व्यक्ति है और वर्तमान में सरकारी रैन बसेरे (शेल्टर होम) में रह रहा है। ऐसे में दिल्ली सरकार को किसी भी ऐसे दस्तावेज पर जोर नहीं देना चाहिए जो उसके पास उपलब्ध न हो। सुनवाई के दौरान एम्स (AIIMS) के वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि मरीज की हालत अभी स्थिर है और उसे ओरल कीमोथेरेपी दी जा रही है। एम्स ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वे मरीज को आगे भी आवश्यक इलाज उपलब्ध कराना जारी रखेंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने दलील दी कि तिवारी के पास अपने इलाज का खर्च उठाने के लिए कोई वित्तीय साधन नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे इस जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए मरीज को आर्थिक सहायता दें। इन दलीलों को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के इलाज के लिए एम्स को 3 लाख की राशि जारी करे।
अदालत में दायर याचिका के अनुसार, विक्रांत तिवारी साल 2024 से इस गंभीर कैंसर से जंग लड़ रहे हैं। इसके अलावा वह तपेदिक (TB) और एचआईवी (HIV) जैसी गंभीर बीमारियों से भी पीड़ित हैं। बेघर होने के कारण वह अपनी सेहत ठीक रहने पर कभी-कभार दिहाड़ी मजदूरी करके अपना गुजारा करते हैं। एम्स ने उनके इलाज का अनुमानित खर्च करीब 3 लाख रुपए बताया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उन्होंने वित्तीय मदद के लिए एम्स, मेडिकल सोशल वर्क ऑफिसर और सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) सहित कई अधिकारियों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं से प्रभावी राहत नहीं मिलने पर उन्हें हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अधिवक्ता अशोक अग्रवाल और कुमार उत्कर्ष के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया था कि अधिकारियों की यह निष्क्रियता संविधान के तहत मरीज के जीने के अधिकार और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। हाई कोर्ट ने एम्स के आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए और दिल्ली सरकार को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर इस याचिका का निपटारा कर दिया।