Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि शादी के बाद पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं बने और वे तुरंत अलग हो गए, तो ऐसे रिश्ते को सार्थक वैवाहिक संबंध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने ऐसे मामलों में 1 साल के अनिवार्य प्रतीक्षा काल से छूट देने की बात कही है।
Delhi High Court:दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। दरअसल, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि किसी विवाह में पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं और वे शादी के तुरंत बाद अलग हो गए हैं, तो ऐसे रिश्ते को 'सार्थक वैवाहिक संबंध' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ऐसे जोड़ों को राहत देते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अनिवार्य 1 वर्ष के प्रतीक्षा काल की शर्त को खत्म कर दिया है।
आपको बता दें कि यह मामला एक ऐसे जोड़े की है, जिसकी शादी मई 2025 में हुई थी। हंसी-खुशी के साथ दोनों की शादी हुई लेकिन दोनों एक साथ एक हफ्ते भी नहीं रह सके। दरअसल, पति-पत्नी दोनों के बीच न तो कोई शारीरिक संबंध बने और न ही भविष्य में साथ रहने की कोई गुंजाइश बची। फिर हार थक कर दोनों ने अलग होने का फैसला किया और इसके लिए तलाक की अर्जी डाल दी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 का हवाला देते हुए शादी के एक साल पूरे होने तक इंतजार करने का आदेश देकर अर्जी खारिज कर दी थी।
एक साल के वेटिंग पीरियड के खिलाफ दंपति हाईकोर्ट पहुंच गए और जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि जब शादी सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हो और असल जिंदगी में पति-पत्नी के बीच कोई रिश्ता विकसित ही न हुआ हो, तो उसे जबरन जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसके साथ ही बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 'शारीरिक संबंधों की पूर्ण अनुपस्थिति और विवाह के तुरंत बाद अलगाव यह साफ करता है कि वैवाहिक संबंध कभी सार्थक रूप से विकसित ही नहीं हुआ। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया को लंबा खींचना दोनों पक्षों के लिए मानसिक प्रताड़ना जैसा है।'
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 का मकसद पति-पत्नी को सुलह का मौका देना होता है, इसलिए आमतौर पर एक साल तक इंतजार करना जरूरी माना जाता है। लेकिन कानून में यह भी प्रावधान है कि अगर स्थिति बेहद कठिन हो, तो इस अवधि में छूट दी जा सकती है। कोर्ट ने दंपति से अलग से बात करने के बाद पाया कि दोनों आपसी सहमति से आगे बढ़ना चाहते हैं और उनके बीच समझौते की कोई गुंजाइश नहीं बची है, इसलिए उन्हें इस नियम से राहत दी गई।