
अभिषेक सिंघल
नई दिल्ली। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध की स्थिति को समस्याओं का ब्यौरा इकट्ठा करने से आगे अब गंभीर बीमारियों के उपचार और समस्याओं के समाधान के लिए शोध करने की ओर प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में एक रोडमैप तैयार किया है जिसके तहत देश में स्वास्थ्य शोध पर होने वाले खर्च को 2047 तक छह गुना बढ़ा कर कुल जीडीपी का .15 प्रतिशत किया जाएगा । अभी भारत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 0.024 प्रतिशत ही खर्च करता है।प्रस्तावित नीति में भारत को दुनिया के शीर्ष तीन स्वास्थ्य अनुसंधान देशों में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इस नीति का मकसद शोध को लैब से जनता तक पहुंचाने की कोशिश करना है।
ड्राफ्ट पालिसी में स्वीकार किया गया है कि भारत का स्वास्थ्य अनुसंधान तंत्र अभी भी कुछ चुनिंदा संस्थानों और क्षेत्रों तक सीमित है तथा शोध का बड़ा हिस्सा समस्याओं के दस्तावेजीकरण तक केंद्रित रहा है।शोध का मूल्य केवल प्रकाशित शोध पत्रों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से तय होगा। इसलिए भविष्य में शोध को इस आधार पर भी आंका जाएगा कि उसने स्वास्थ्य सेवाओं, नीति निर्माण, तकनीकी नवाचार और मरीजों के जीवन में कितना बदलाव लाया।
नीति के तहत पहली बार राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा तैयार किया जाएगा, जो देशभर में स्वास्थ्य शोध की दिशा तय करेगा। इसमें तय होगा कि किस बीमारी, तकनीक या स्वास्थ्य चुनौती पर प्राथमिकता के आधार पर संसाधन लगाए जाएं।
इस एजेंडे में देश की पारंपरिक स्वास्थ्य चुनौतियों के साथ भविष्य की जरूरतों को भी शामिल किया गया है। टीबी, कैंसर, मानसिक स्वास्थ्य, गैर-संचारी रोग, एनीमिया, मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन, महामारी तैयारी और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसे उभरते खतरों को भी राष्ट्रीय शोध एजेंडे में स्थान मिला है।
नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि पहली बार स्वास्थ्य शोध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई ), रोबोटिक्स, जीन एवं सेल थेरेपी, डिजिटल हेल्थ और डेटा साइंस जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।आने वाले दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा इन्हीं तकनीकों से तय होगी। एआई आधारित रोग पहचान, रोबोटिक सर्जरी, व्यक्तिगत चिकित्सा (पर्सनलाइज्ड मेडिसिन), जीन एडिटिंग और उन्नत बायोटेक्नोलॉजी भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जा सकती हैं।
अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य अनुसंधान और बायोटेक्नोलॉजी पर भारी निवेश किया है। चीन आज जीनोमिक्स, कैंसर रिसर्च और एआई आधारित स्वास्थ्य तकनीकों में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। भारत की नई नीति इसी अंतर को कम करने की कोशिश है। देश केवल दुनिया की दवाइयां बनाने वाला “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” न रहे, बल्कि नई चिकित्सा तकनीकों, उपचारों और स्वास्थ्य समाधानों के विकास में भी वैश्विक नेतृत्व करे।
-बीमारी को समझना (डिस्क्रिप्टिव रिसर्च)
-नई खोज (डिस्कवरी रिसर्च)
-समाधान विकसित करना (डवलपमेंट रिसर्च)
-समाधान को लोगों तक पहुंचाना (डिलीवरी रिसर्च)
टीबी, कैंसर, एनीमिया, मानसिक स्वास्थ्य, गैर-संचारी रोग, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य
-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)
-डिजिटल हेल्थ
-जीन और सेल थेरेपी
-मोटापा
-जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य
राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान स्टीवर्डशिप समिति राष्ट्रीय रिसर्च इंटीग्रिटी ऑफिस का प्रस्ताव राज्यों की भागीदारी बढ़ेगी,अलग फ्रेमवर्क मरीजों और समुदायों की राय को महत्व
शोध से सीधे समाधान लैब से मरीज तक तकनीक स्वदेशी स्वास्थ्य नवाचार विकसित भारत 2047 के लिए वैज्ञानिक आधार
स्वास्थ्य अनुसंधान निवेश: 0.024% जीडीपी से बढ़ाकर 0.15% जीडीपी
लक्ष्य: स्वास्थ्य अनुसंधान में दुनिया के शीर्ष-3 देशों में शामिल होना
-पहली बार राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा
-AI, रोबोटिक्स, जीन और सेल थेरेपी को प्राथमिकता टीबी, कैंसर, मानसिक स्वास्थ्य और एनीमिया पर फोकस जारी
-महामारी तैयारी और वन हेल्थ दृष्टिकोण को बढ़ावा
| अग्रणी देश | जीडीपी का % |
| अमेरिका | 0.4% से अधिक |
| ब्रिटेन | 0.2%+ |
| दक्षिण कोरिया | 0.3% |
| भारत | 0.024% |