
नई दिल्ली। अमरीका की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की राह खुलने के साथ भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा की नई चुनौती खड़ी हो गई है। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि वो अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्तराष्ट्रीय बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार विविधता के साथ आगे बढ़ने के अपने रुख पर कायम है।
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़ा विधेयक पारित कर दिया है। अब यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए जाएगा। कानून लागू होने पर रूस से तेल खरीद जारी रखने वाले देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार अमरीकी राष्ट्रपति को मिल सकता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि रूसी तेल की खरीद घटानी पड़ी तो क्या दूसरे स्रोत इतनी बड़ी मात्रा में तेल उपलब्ध करा पाएंगे और उसकी कीमत क्या होगी।
भारत की ताकत यह है कि उसकी क्रूड खरीद केवल रूस पर निर्भर नहीं है। देश 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीदता है। रूस के बाद इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख स्रोत हैं। इसके अलावा अमरीका, ब्राजील, वेनेजुएला, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से भी खरीद बढ़ाई जा सकती है। इस साल पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने पर भारतीय रिफाइनरों ने लैटिन अमेरिका और अफ्रीका से खरीद बढ़ाकर अपनी सप्लाई को संभाला था। जुलाई में रूसी क्रूड भारत के कुल आयात का करीब 50.8 फीसदी तक पहुंच गया था और अप्रैल-जुलाई में औसत हिस्सेदारी 43.25 फीसदी रही। रूस के बाद इराक, सऊदी अरब और यूएई से अतिरिक्त बैरल जुटाए जा सकते हैं, लेकिन इनकी उपलब्धता वैश्विक मांग, पश्चिम एशिया की स्थिति और शिपिंग लागत पर निर्भर करेगी।
कीमत के मोर्चे पर सबसे बड़ा जोखिम रूसी तेल की छूट खत्म होने का है। भारतीय रिफाइनरों को रूसी यूराल क्रूड पर इस साल कुछ समय में ब्रेंट के मुकाबले 10 डॉलर प्रति बैरल से अधिक की छूट भी मिली है। यदि इसकी जगह अपेक्षाकृत महंगा मध्य-पूर्वी, अमेरिकी या लंबी दूरी से आने वाला क्रूड लिया जाता है तो रिफाइनिंग लागत और आयात बिल बढ़ सकता है। साथ ही बीमा और मालभाड़ा बढ़ने पर दबाव और बढ़ेगा।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर हालांकि तत्काल और सीधे तौर पर तय नहीं होगा। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बाजार आधारित हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतों तथा अन्य बाजार परिस्थितियों के अनुरूप तेल विपणन कंपनियां कीमत तय करती हैं। सरकार पहले भी वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल के दौरान उत्पाद शुल्क और अन्य उपायों के जरिए उपभोक्ताओं पर असर सीमित कर चुकी है।