नई दिल्ली

हम UGC पर बहस रहे हैं और महाराष्ट्र का ये गांव गया जाति मुक्त मॉडल

इस गांव में सभी धर्म जाति के लोग रहते हैं लेकिन सब समान हैं। पूरा गांव आज देशभर की जनता के लिए नजीर बना गया है।

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गांव के पंचायत कार्यालय का फाइल फोटो

Maharashtra News जब देश में UGC पर बहस चल रही है इसी बीच, महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित सौंदाला गांव ने सामाजिक समरसता की मिसाल बन गया है। पांच फरवरी को इस गांव में ग्राम सभा की बैठक हुई। इस बैठक में सबकी सहमति से जाति-मुक्त प्रस्ताव पारित हो गया। इस प्रस्ताव का मतलब यह है कि अब इस गांव में जाति, धर्म, पंथ या नस्ल के आधार पर किसी भी तरह का कोई भी भेदभाव नहीं होगा।

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बदल गई लोगों की जिंदगी ( Maharashtra News )

यकीन मानिए कि इस फैसले ने गांव की रोजमार्रा की जिंदगी को सुंदर कर दिया है। गांव के मंदिर के बाहर पांचवीं कक्षा के बच्चे गोल घेरा बनाकर छात्रवृत्ति परीक्षा दे रहे हैं और इनमें हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय के बच्चे साथ बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। मीडियाकर्मियों के एक सवाल का इस गांव के बच्चे बड़ी ही सहजता से जवाब देते हैं। कहते हैं कि, हमारे गांव सब साथ मिकर त्यौहार मनाते हैं। एक-दूसरे के यहां खाना खाते हैं। यहां कोई फर्क नहीं किया जाता।

पंचायत का नारा ''मेरा धर्म ही मानवता की सोच''

इस गांव के सरपंच शरद अरगड़े हैं। इन्ही की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित हुआ है। प्रस्ताव में साफ शब्दों में लिखा गया है कि गांव के सभी नागरिक समान होंगे। पूरा गांव "मेरा धर्म मानवताठ" की भावना को अपनाएगा। मंदिर, श्मशान, जल स्रोत, स्कूल, सरकारी सेवाएं और सार्वजनिक कार्यक्रम सभी के लिए खुले रहेंगे। सोशल मीडिया पर जातीय तनाव फैलाने वाले संदेश डालने पर भी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। इस गांव की आबादी करीब 2500 की है। गांव में लगभग 65 प्रतिशत लोग मराठा समाज से हैं। 20 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति की है। खास बात ये हैं कि इनमें से कुछ परिवार ईसाई धर्म को मानते हैं। इसी गंव में तीन मुस्लिम परिवार भी रहते हैं।

पहले भी कभी नहीं हुआ कोई विवाद ( Maharashtra News )

अगर इस गांव के इतिहास की बात की जाए तो यहां पहले भी कभी कोई विवाद नहीं हुआ। गांव के सरपंच अरगड़े का कहना है कि गांव में पिछले दस वर्षों में जातीय अत्याचार का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। बोले कि, आज समाज में नफरत और बंटवारे की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में वह नहीं चाहते कि उनके गांव में भी इस तरह के विचार उत्पन्न हों।

एक दूसरे के धार्मिक स्थलों का भी सम्मान

इसी गांव में एक जिला परिषदीय स्कूल है। इस स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक अशोक पंडित ने कहा है कि, उनका फोकस आने वाली नस्लों पर है। बताया कि, उनके गांव के बच्चे भी एक दूसरों के धर्मिक स्थलों का सम्मान करते हैं। स्कूल के बाहर मंदिर है तो आते-जाते वक्त और खासकर परीक्षाओं में सभी बच्चे मंदिर में सिर झुकाते हैं। इससे पता चलता है कि गांव की अगली पीढ़ी में भी किसी जाति या अन्य आधार पर कोई भेदभाव नहीं है।

पहले भी इस गांव में हो चुके हैं ऐसे समाजिक फैंसले

सौंदाला गांव इससे पहले भी समाज सुधार के फैसले कर चुका है। गांव वाले बताते हैं कि सितंबर 2024 में ग्राम सभा ने विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन देने के लिए 11 हजार रुपये की सहायता राशि देने का निर्णय किया था। इसी तरह से नवंबर 2024 में महिलाओं का अपमान करने वाली गालियों पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस गांव के लोग गालियां नहीं देते हैं। वर्तमान में सोंदाला गांव पूरे क्षेत्र के लिए नजीर बन गया है।

Updated on:
21 Feb 2026 06:29 pm
Published on:
21 Feb 2026 06:28 pm
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