नई दिल्ली

पति-पत्नी की बढ़ती खामोशी से रिश्तों में ‘तीसरे’ की एंट्री, दिल्ली-NCR और महाराष्ट्र सबसे आगे

Relationship Issues: बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया और व्यस्त दिनचर्या के बीच पति-पत्नी के रिश्तों में संवाद की कमी एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भावनात्मक दूरी और बातचीत में कमी रिश्तों में 'तीसरे व्यक्ति' के हस्तक्षेप की बड़ी वजह बन रही है। दिल्ली-NCR और महाराष्ट्र में ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक पाई गई है, जहां सोशल मीडिया और कार्यस्थल के सहकर्मी रिश्तों पर असर डाल रहे हैं।

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AI से बना प्रतीकात्मक फोटो

Third Person in Relationship: आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल व्यस्तता ने भारतीय घरों की खुशियों को 'साइलेंट मोड' पर डाल दिया है। 'ग्लोबल रिलेशनशिप इंडेक्स 2026' और 'जर्नल ऑफ फैमिली साइकोलॉजी' के शोध बताते हैं कि पति-पत्नी के बीच बातचीत की कमी न केवल दूरियां बढ़ा रही है, बल्कि रिश्ते में 'तीसरे' को एंट्री का मौका भी दे रही है। देश में करीब 40% शहरी दंपतियों के बीच भावनात्मक संवाद सप्ताह में 3 घंटे से भी कम हो गया है। यह खामोशी शक और असुरक्षा को बढ़ाती जा रही है।

रिपोर्ट में पया गया कि 45% मामलों में सोशल मीडिया की 'वर्चुअल दुनिया' और कार्यस्थल के 'सहकर्मी' रिश्तों में तीसरे व्यक्ति के रूप में पाए गए। 25% तलाक के मामलों की मुख्य वजह भी भावनात्मक संवादहीनता है। जब घर के भीतर भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो व्यक्ति बाहर सहारा ढूंढता है, जो अंतत: विश्वास की नींव को हिला देता है। यह संकट महानगरों तक ही नहीं छोटे शहरों को भी गिरफ्त में लेता जा रहा है।

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डिजिटल डिटॉक्स की कमी और शक

साइकलॉजी टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, 60% भारतीय दंपती बेडरूम में पार्टनर से ज्यादा समय स्मार्टफोन को दे रहे हैं। 'पबिंग' (पार्टनर को नजरअंदाज कर फोन चलाना) के कारण एक-दूसरे की नीयत पर शक बढ़ रहा है। जब संवाद बंद होता है, तो पार्टनर की हर छोटी गतिविधि संदिग्ध लगने लगती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि घर में 'नो-गैजेट जोन' न होना शक की आग में घी का काम कर रहा है।

वर्कप्लेस का बढ़ता इमोशनल दखल

मिंटेल 2026 की स्टडी के मुताबिक, काम के बढ़ते घंटों और 'वर्क-लाइफ बैलेंस' बिगडऩे से सहकर्मियों के साथ बिताया समय पार्टनर से अधिक हो गया है। 30% शहरी मामलों में पति-पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति की एंट्री वर्कप्लेस के माध्यम से हो रही है। ऑफिस की समस्याओं को पार्टनर के बजाय किसी तीसरे से साझा करना 'इमोशनल अफेयर' की पहली सीढ़ी बन रहा है, जो आगे चलकर अलगाव का कारण बनता है।

मासूमों पर खामोशी का 'टॉक्सिक' असर

एनसीईआरटी ने पिछले साल एक व्यापक सर्वे में पाया गया कि जिन घरों में माता-पिता के बीच बातचीत बंद है, वहां बच्चों में डिप्रेशन और एंग्जायटी का स्तर 55% अधिक है। माता-पिता के बीच तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी या उनके लगातार झगड़ों/चुप्पी से बच्चों का आत्मविश्वास गिर रहा है। उनकी शैक्षणिक एकाग्रता में 18% की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे यह समस्या एक पूरी पीढ़ी के व्यवहार को प्रभावित कर रही है।

एक ही समाधान- 'हियरिंग' नहीं 'लिसनिंग'

फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी (2026) के अनुसार, जो दंपती रोजाना केवल 20 मिनट बिना फोन के एक-दूसरे को सुनते हैं, उनके रिश्ते में 'तीसरे की एंट्री' की संभावना 80% तक कम हो जाती है। विशेषज्ञ 'रिलेशनशिप काउंसलिंग' और 'वीकेंड बॉन्डिंग' को अनिवार्य मानते हैं। आपसी विश्वास बहाल करने के लिए शब्दों से ज्यादा 'भावनात्मक उपस्थिति' और पारदर्शिता को रिश्तों का सुरक्षा कवच बताया गया है।

पति-पत्नी के बीच तीसरे की एंट्री से प्रभावित वैवाहिक रिश्ते (%)



राज्य202120222023202420252026
दिल्ली323334353739
महाराष्ट्र303133353638
कर्नाटक272930323435
गुजरात242527293032
उत्तर प्रदेश222324252628
राजस्थान181920212325
मध्य प्रदेश171819202223
बिहार192021222324
छत्तीसगढ़161718192022


स्रोत: इंडियन जर्नल ऑफ फैमिली साइकोलॉजी 2026

Published on:
01 Jun 2026 03:26 pm
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