
साकेत बिल्डिंग हादसा: दूसरों की जान बचाने मलबे में वापस दौड़ीं 'मेस वाली आंटी' (Photo: X/IANS)
कुछ लोग अपने पीछे सिर्फ यादें नहीं, बल्कि हजारों दिलों में एक खालीपन छोड़ जाते हैं। ऐसी ही थीं पार्वती, जिन्हें इलाके के छात्र प्यार से सिर्फ ‘मेस वाली आंटी’ कहकर बुलाते थे। मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे सैकड़ों छात्रों के लिए उनकी छोटी-सी मेस सिर्फ खाने की जगह नहीं, बल्कि घर से दूर एक दूसरा घर जैसा था। लेकिन शनिवार को दक्षिण दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास हुए दर्दनाक हादसे ने इस अपनापन भरी दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। इस हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई और 10 से ज्यादा घायल हुए।
चश्मदीदों ने बताया कि जब पास की इमारत में दरारें पड़ने लगीं और गिरने का खतरा दिखाई दिया, तब पार्वती अपनी जान बचाने के लिए बाहर निकल आई थीं। लेकिन मेस के अंदर अभी भी कई छात्र खाना खा रहे थे। उन्हें खतरे से अनजान देखकर वह दोबारा अंदर दौड़ पड़ीं ताकि सभी को बाहर निकाल सकें। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ ही सेकंड बाद पूरी इमारत भरभराकर गिर गई और पार्वती समेत कई लोग मलबे में दब गए।
घटना के बाद सबसे ज्यादा टूटे हुए वे छात्र दिखे, जो वर्षों से पार्वती की मेस में खाना खाते आ रहे थे। कई छात्रों को तो उनका असली नाम तक नहीं पता था। उनके लिए वह सिर्फ ‘आंटी’ थीं, जो हर दिन मुस्कुराते हुए खाना परोसती थीं।
एक छात्र ने भावुक होकर कहा, "आंटी कभी किसी को मना नहीं करती थीं। चाहे रात कितनी भी हो जाए, अगर कोई भूखा पहुंच जाता तो उसके लिए खाना जरूर बनाती थीं।"
मोहम्मद इमाम नामक छात्र ने बताया कि पार्वती बेहद कम कीमत पर दाल, चावल, सब्जी, सलाद, पराठा और ऑमलेट परोसती थीं। कई बार हम दुकान बंद होने के समय पहुंचते थे, लेकिन वह फिर से रसोई में जाकर हमारे लिए पराठे बना देती थीं।
टिन की छत वाली साधारण सी मेस में दिनभर छात्रों की भीड़ लगी रहती थी। यहां मेडिकल, इंजीनियरिंग और एफएमजी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र घंटों पढ़ाई के बाद खाना खाने आते थे।
एमबीबीएस छात्र कपिल ने बताया, यहां महाराष्ट्र, दक्षिण भारत और देश के कई हिस्सों से आए छात्र पढ़ाई करते हैं। सुबह से शाम तक कोचिंग और पढ़ाई के बीच यह मेस उन्हें घर का एहसास देती थी। एक दिन में आसानी से 100 से ज्यादा छात्र यहां खाना खाने आते थे।
स्थानीय निवासी दीपिका ने कहा कि आसपास के परिवार भी सिर्फ पार्वती की चाय पीने के लिए यहां आते थे।
मूल रूप से नेपाल की रहने वाली पार्वती पिछले डेढ़ साल से साकेत इलाके में यह मेस चला रही थीं। इससे पहले वह करीब चार वर्षों तक पास में एक छोटी कैंटीन चलाती थीं। बाद में छात्रों और कोचिंग सेंटरों के करीब रहने के लिए उन्होंने एक पुराने शॉप को मेस में बदल दिया।
धीरे-धीरे उनकी मेस छात्रों के बीच इतनी लोकप्रिय हो गई कि एक बैच दूसरे बैच को उनके यहां खाने की सलाह देता था। पता बदल गया, लेकिन ग्राहकों का प्यार कभी कम नहीं हुआ।
घटनास्थल पर पार्वती की बेटी नीलम और दामाद अनिकेत देर रात तक राहत और बचाव दल से जानकारी लेते रहे। दोनों की शादी महज एक महीने पहले ही हुई थी। नीलम ने मीडिया से बात करते हुए कहा, देर रात तक मुझे मलबे के अंदर से मां की चीखें सुनाई दे रही थीं। फिर वह शांत हो गईं।
घटना के बाद जब छात्र घटनास्थल पर पहुंचे तो सबसे पहला सवाल यही था, आंटी कहां हैं? शायद किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ दिनों बाद यही मेस और उसकी आत्मा कही जाने वाली पार्वती सिर्फ यादों में रह जाएंगी।
Updated on:
01 Jun 2026 02:49 pm
Published on:
01 Jun 2026 01:38 pm
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