
अभिषेक सिंघल
नई दिल्ली। यदि गांव में शहरों जैसी सुविधाएं हैं, खेती के बजाय दूसरी आर्थिक गतिविधियां हैं तो आने वाले समय में उस गांव को शहर घोषित कर दिया जाए तो चौंकिएगा नहीं। देश में 65 साल बाद शहरी व ग्रामीण क्षेत्र घोषित करने के नए पैमानों पर विचार शुरू हो गया है। आधिकारिक सू्त्रों ने बताया कि 1961 के बाद पहली बार मानक बदलने के बड़े नीतिगत सुधार की यह कवायद शुरू की गई है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2047 में विकसित भारत बनाने का विजन बताया जाता है। सरकार का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन नेटवर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी और आबादी की बसावट का पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है। अब कई जगहों पर गांवों में भी शहरों की सी स्थिति है। लेकिन सिर्फ प्रशासनिक तौर पर शहरी क्षेत्र घोषित कर देने से भी उस क्षेत्र का नियोजित विकास सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। फिलहाल इस कवायद के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई है।
नए पैमानों का उद्देश्य किसी क्षेत्र से योजनाओं का लाभ छीनना नहीं होगा, बल्कि ग्रामीण बनाम शहरी के बजाय शहरीकरण के स्तर के आधार पर संसाधनों का आवंटन करना होगा। इससे शहरों के आसपास के पेरी-अर्बन क्षेत्रों के लिए अलग नीतियां बन सकेंगी। मोबिलिटी, परिवहन, आवास, जल आपूर्ति और कचरा प्रबंधन की योजना अधिक सटीक होगी।
नई दिल्ली में हाल ही सम्पन्न हुई ब्रिक्स देशों के शहरी योजनाकारों के फोरम में भी अलग अलग देशों के शहरी और ग्रामीण पैमानों को लेकर चर्चा हुई। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल ने बताया कि भारतीय मानकों के हिसाब से भारत की शहरी आबादी लगभग 36% है, जबकि संयुक्त राष्ट्र की डीगुर्बा पद्धति के विशेषज्ञों का दावा है कि भारत की करीब 80% आबादी किसी न किसी रूप में शहरी क्षेत्र में हो सकती है।
डिगुर्बा (डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन) संयुक्त राष्ट्र, यूरोस्टेट व विश्व बैंक की मानकीकृत पद्धति है। इसमें शहरीकरण का आधार प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि जनसंख्या घनत्व और उपग्रह चित्रों से दिखने वाले निर्मित क्षेत्र को आधार माना जाता है।
वैधानिक निकायः वे क्षेत्र जिन्हें राज्य सरकार पालिका-परिषद जैसे शहरी निकाय घोषित करे। सेंसस टाउन: जहां जनसंख्या 5000 से ज्यादा, जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी, पुरुष कार्यबल का 75% गैर-कृषि कार्याें में संलग्न हो।
जनसंख्या घनत्व, बिल्ट-अप एरिया का प्रतिशत, गैर-कृषि रोजगार का अनुपात,रोजाना आवागमन का स्तर सड़क व परिवहन सुविधा, डिजिटल कनेक्टिविटी, जल, सीवरेज एवं कचरा प्रबंधन सुविधा, आर्थिक गतिविधियों की विविधता।
नियोजित विकास, ज्यादा सुविधाएं, वित्त आयोग के अनुदान व सरकारी सहायता, शहरी विकास बजट, मास्टर प्लानिंग, भूमि उपयोग नीति से लाभ। इन लाभों से उलट शहरों में प्रदूषण, कचरा कुप्रबंधन, अपराध जैसी समस्याएं पैदा होने का जोखिम रहेगा।
-भारत की 31.1% आबादी शहरी और 68.9% ग्रामीण (2011सेंसस)
-देश में 6,40,930 गांव व करीब 7935 शहर 2025 में
दुनिया की 45% आबादी शहरों, 36% आबादी कस्बों और 19% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में (यूएन)