
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल करियर बनाना नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य निर्माण से ही राष्ट्र निर्माण संभव है। भारत की पहचान आर्थिक या सैन्य शक्ति बनने में नहीं, बल्कि दुनिया को ‘मनुष्यता का ज्ञान’ देने में है।
भागवत बुधवार को नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय और विद्यालय की ओर से आयोजित संवाद कार्यक्रम में कक्षा 10 से स्नातकोत्तर तक के विद्यार्थियों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने छात्रों के सवालों के जवाब देते हुए कहा कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार है और उसमें स्वाभाविक रूप से अधिक साहस है। उन्होंने युवाओं से अपनी प्रतिभा का उपयोग देश और समाज के हित में करने का आह्वान किया।
विदेश जाने वाले युवाओं को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि विदेशों में बहुत कुछ मिल सकता है, लेकिन व्यक्ति की पहचान उसके देश से होती है। उन्होंने कहा कि भारत के अन्न और जल से हमारा शरीर बना है। इसलिए व्यक्ति को अपनी जरूरत के लिए जितना आवश्यक हो उतना रखकर शेष समाज और देश के लिए समर्पित करने की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ ऐसी शिक्षा की भी जरूरत है, जो विद्यार्थियों में मानवता के गुण विकसित करे। इसके लिए उन्होंने संतों और महापुरुषों के उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि कि अभी जो फिल्म ‘हनुमान अंश’ आई है, उसमें ‘नीब करोरी बाबा’ हैं। ‘स्टीव जॉब्स’ भी उनसे मिलने आए थे। स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस जी की भी स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी। भारत में ऐसे बहुत से संतों की नियमित शिक्षा नहीं हुई, लेकिन वो समाज के ‘लीडर’ बने क्योंकि उनका मनुष्यता का स्तर बहुत ऊंचा था। इसलिए आज आधुनिक शिक्षा के साथ ही मानवता के गुणों को बढ़ाने वाली शिक्षा की भी आवश्यकता है।
भागवत ने कहा कि भारत का लक्ष्य दुनिया की सैन्य या आर्थिक महाशक्ति बनना नहीं है। भारत को विश्वगुरु के सिंहासन पर पुनर्स्थापित करना है। उन्होंने कहा कि भारत की विशिष्टता उसके उस ज्ञान में है, जो मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की दिशा देता है।