नई दिल्ली

नई पिच पर सियासी खेल: भाजपा के हिंदुत्व 2.0 के सामने विपक्ष तलाश रहा नैरेटिव

पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। भाजपा अब ‘हिंदुत्व 2.0’ को सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक मॉडल के तौर पर आगे बढ़ा रही है। इसके मुकाबले कांग्रेस, सपा और आप जैसे विपक्षी दल अभी भी अपने मुद्दों, नेतृत्व और गठबंधन को लेकर स्पष्ट दिशा तय नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि सियासी लड़ाई अब सीटों से ज्यादा नैरेटिव की जंग बनती जा रही है।

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। भाजपा अब ‘हिंदुत्व 2.0’ को सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक मॉडल के तौर पर आगे बढ़ा रही है। इसके मुकाबले कांग्रेस, सपा और आप जैसे विपक्षी दल अभी भी अपने मुद्दों, नेतृत्व और गठबंधन को लेकर स्पष्ट दिशा तय नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि सियासी लड़ाई अब सीटों से ज्यादा नैरेटिव की जंग बनती जा रही है।

दरअसल, भाजपा ने असम और पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व के रथ पर सवार होकर जीत हासिल की है। इससे बढ़कर भाजपा को कांग्रेस, टीएमसी और वाम दलों समेत अन्य को घेरने के लिए मुस्लिम विधायकों की संख्या से नया सियासी हथियार मिला है। जहां असम में कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम है, वहीं बंगाल में कांग्रेस के दोनों विधायक, वाम दलों के दोनों विधायक मुस्लिम है। इसके अलावा टीएमसी से अच्छी संख्या में मुस्लिम विधायक चुनाव जीते हैं। भाजपा अब विपक्ष को सिर्फ मुस्लिमों की पार्टी बताकर घेर रही है। विपक्ष के सामने इस तरह के नैरेटिव को तोड़ने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है।

हार्डकोर से हाइब्रिड: भाजपा का बदला हुआ फॉर्मूला

भाजपा का मौजूदा मॉडल पहले से ज्यादा परिष्कृत और बहुस्तरीय है। इसमें धार्मिक-सांस्कृतिक मुद्दों के साथ कल्याणकारी योजनाओं का मजबूत मिश्रण है। असम में ‘घुसपैठ’ और पहचान की राजनीति के साथ वेलफेयर का संतुलन दिखा, तो बंगाल में ‘सुरक्षा बनाम तुष्टिकरण’ का नैरेटिव लाभार्थी वर्ग से जोड़ा गया। यानी भाजपा अब हिंदुत्व, वेलफेयर और कानून व्यवस्था के हाइब्रिड मॉडल पर आगे बढ़ रही है। जो उसे नए सामाजिक वर्गों तक पहुंचने में मदद कर रहा है।

एसआइआर: डेटा से जनभावना तक की अधूरी लड़ाई

स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआइआर) को लेकर विपक्ष हमलावर है और आरोप है कि बड़े पैमाने पर मुस्लिम और विपक्ष समर्थक नाम हटाए गए। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह मुद्दा ‘डेटा’ से निकलकर ‘जनभावना’ बन पाया है? फिलहाल नहीं। जबकि भाजपा इसे ‘पारदर्शिता’ और ‘शुद्धिकरण’ का मुद्दा बनाकर पेश कर रही है।

सोशल बनाम सांस्कृतिक इंजीनियरिंग

आने वाले विधानसभा चुनावों, खासतौर पर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल में असली मुकाबला भाजपा की सांस्कृतिक इंजीनियरिंग (हिंदुत्व 2.0) और विपक्ष की सोशल इंजीनियरिंग (ओबीसी, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समीकरण) के बीच होगा। भाजपा जातीय सीमाओं से ऊपर एक व्यापक हिंदू पहचान गढ़ने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष अब भी जातीय गणित के सहारे जवाब तलाश रहा है। हाल के चुनावों का ट्रेंड बताता है कि सांस्कृतिक नैरेटिव, जातीय समीकरण पर भारी पड़ रहा है।

विपक्ष का कमजोर मैसेज पैकेजिंग

विपक्ष ने 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान बचाने और ओबीसी का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया तो नतीजे भी अच्छे मिले, लेकिन उसके बाद के चुनावों में विपक्ष फिर से अपने नैरेटिव गढ़ने में पिछड़ गया। हालांकि विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय-सब मौजूद हैं।

समस्या है मैसेज और पैकेजिंग की। मुद्दे बिखरे हुए हैं, रणनीति असंगठित और नैरेटिव रिएक्टिव है। इसका नतीजा विपक्ष अक्सर भाजपा के एजेंडे पर ही खेलता नजर आता है, और अपना एजेंडा सेट नहीं कर पाता।

गठबंधन बनाम जमीन की हकीकत

इंडिया ब्लॉक अभी भी एक स्थायी राजनीतिक प्लेटफॉर्म बनने से दूर है। उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य में सपा और कांग्रेस के बीच तालमेल को लेकर सवाल बने रहते हैं। ध्रुवीकरण की राजनीति के इस केंद्र में विपक्ष के लिए सिर्फ गठबंधन काफी नहीं—स्पष्ट रणनीति, मजबूत नेतृत्व और जमीनी तालमेल जरूरी है। वहीं भाजपा ने यूपी जैसे बड़े राज्य में छोटे छोटे दलों से गठबंधन कर रखा है।

कांग्रेस के 664 विधायकों में से 78 प्रतिशत हिंदू और 12 प्रतिशत मुस्लिम: खेड़ा

भाजपा ने मुस्लिम वोटरों को ठुकराया तो मुस्लिम वोटरों ने भाजपा को ठुकरा दिया। ऐसे में जब मुसलमानों ने कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी को वोट दिया तो भाजपा को उसमें भी शिकायत होने लगी। क्या बाबा साहेब डॉ भीम राव अंबेडकर का संविधान ऐसी सोच और राजनीतिक संस्कृति की इजाजत देता है? देशभर में कांग्रेस के 664 विधायकों में से 78 प्रतिशत हिंदू हैं और 12 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कांग्रेस हमेशा आबादी के अनुसार सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देती आई है, जबकि भाजपा दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं को कमजोर करना चाहती है।

-पवन खेड़ा, अध्यक्ष, कांग्रेस मीडिया और पब्लिसिटी विभाग

Published on:
08 May 2026 02:02 pm
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