
चारू माथुर, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
राष्ट्रगीत के गायन और उसमें बाधा डालने के मामले में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 इस प्रकार है: “3. जो कोई भी, जानबूझकर— (a) राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने से रोकता है; या (b) ऐसे गायन में लगी किसी सभा में बाधा डालता है, उसे तीन साल तक की जेल, या जुर्माना, या दोनों की सज़ा हो सकती है।”
यह संशोधन क्या करता है? यह किसी भी ऐसे व्यक्ति को सजा देता है जो जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने से रोकता है या राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने में लगी किसी सभा में बाधा डालता है। आजादी की लड़ाई के दौरान, खासकर अकाल के समय, 'वंदे मातरम' लोगों को एकजुट करने वाला नारा था। इसे सबसे पहले 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी ने एक कविता के रूप में लिखा था और बाद में उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया गया। बाद में यह आज़ादी के आंदोलन का मुख्य नारा बन गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में इसके पहले दो धर्म-निरपेक्ष छंदों को अपनाया और बाकी छंदों को छोड़ दिया क्योंकि उनमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र था। उस समय मुस्लिम लीग को इस पर आपत्ति थी। पहले दो छंद मातृभूमि की वंदना करते हैं, बाकी छंद भी ऐसा ही करते हैं लेकिन हिंदू देवी-देवताओं का आह्वान करते हुए - ऐसा काम वे लोग नहीं करेंगे जो मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं रखते।
जनवरी 2026 के गृहमंत्रालय के निर्देश के तहत यह सभी सरकारी कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया। गृह मंत्रालय के इस निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई थी, लेकिन उस पर सुनवाई नहीं हुई क्योंकि इसमें सजा का प्रावधान नहीं था। राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 का संशोधन सजा का प्रावधान करता है। हालांकि, शोर-शराबे में मुख्य कानूनी बात अक्सर छूट जाती है: 2026 का संशोधन किसी व्यक्ति के 'वंदे मातरम' न गाने के फैसले को अपराध नहीं मानता। संशोधित धारा 3 के तहत, दूसरों को इसे गाने से जानबूझकर रोकने या ऐसा करने में लगी सभा में बाधा डालने पर सजा का प्रावधान है। यह उस व्यक्ति पर लागू नहीं होता जो बस इसे गाने से इनकार कर देता है।
यह एक महत्वपूर्ण अंतर है। यह याद रखना चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद मौखिक रूप से दोहराया था, कि 'बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य' (1986) का मामला - जिसने धार्मिक आधार पर राष्ट्रगान न गाने वाले स्कूली बच्चों को सुरक्षा दी थी - अभी भी मान्य कानून है, और किसी भी ऐसे व्यक्ति को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ऐसा करने से इनकार करता है।
हालाँकि, संशोधन में बिना किसी स्पष्टीकरण के "बाधा" (डिस्टर्बेंस) जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसका दायरा बहुत बड़ा और अस्पष्ट है - उदाहरण के लिए - कोई टीचर गाने के इतिहास पर चर्चा करे या 'वंदे मातरम' का कुछ हिस्सा ही गाए, तो इसे भी बाधा माना जा सकता है। और फिर इसके लिए आपराधिक ज़िम्मेदारी भी तय हो सकती है। हालांकि, असली मुद्दा यह है कि पूरे 6 पद गाए जाएं या सिर्फ़ दो। क्या सिर्फ़ 2 पद गाना बाधा माना जाएगा? मेरी राय में संशोधन तो बना रहेगा, लेकिन असली विवाद छह पदों वाले हिस्से को लेकर है।