भस्म आरती री अनुमति के बावजूद दर-दर भटके श्रद्धालु अव्यवस्था का आलम: सुरक्षा गार्डों के अड़ियल रवैये और पार्किंग भेदभाव ने खड़े किए गंभीर सवाल
उज्जैन: देश की आंतरिक सुरक्षा में 17 वर्षों तक अपना जीवन समर्पित करने वाले एनएसजी कमांडो सांवरा जाट के लिए घर वापसी का अनुभव कड़वा साबित हुआ। भगवान महाकाल के अनन्य भक्त सांवरा जाट अपनी ड्यूटी पूरी कर पहली बार घर लौट रहे थे और उनकी इच्छा बाबा की भस्म आरती के दर्शन करने की थी। उन्होंने बाकायदा प्रोटोकॉल के तहत बुकिंग भी कराई थी, लेकिन 31 जनवरी की रात उज्जैन मंदिर प्रशासन की अव्यवस्थाओं ने उनकी आस्था को गहरी ठेस पहुंचाई। मंदिर परिसर में व्याप्त कुप्रबंधन और कर्मचारियों के व्यवहार ने न केवल एक सैनिक को आहत किया, बल्कि आम श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
कमांडो सांवरा जाट के अनुसार, भस्म आरती में शामिल होने की उनकी कोशिश किसी बाधा दौड़ से कम नहीं थी। जब वे नीलकंठ द्वार पहुंचे, तो उन्हें गेट नंबर एक पर भेज दिया गया। वहां पहुंचने पर गार्ड्स ने उनसे "अटेंडर के फोन" की मांग की और वैध बुकिंग होने के बावजूद प्रवेश देने से मना कर दिया। आलम यह था कि उनके साथ 20 से 30 अन्य श्रद्धालु भी हाथ में कंफर्म बुकिंग लिए एक गेट से दूसरे गेट तक ठंड में भटकने को मजबूर थे। श्रद्धालुओं को समझ नहीं आ रहा था कि जब डिजिटल युग में बुकिंग वैध है, तो उन्हें प्रवेश के लिए किसी 'कॉल' का इंतजार क्यों करना पड़ रहा है।
पार्किंग की समस्या ने इस परेशानी को और बढ़ा दिया। सांवरा जाट ने बताया कि आम जनता के लिए पार्किंग बंद होने के बोर्ड लगे थे, जबकि रसूखदारों के वीआईपी वाहन बेरोकटोक अंदर जा रहे थे। इस भेदभाव और गार्ड्स के चिल्लाकर बात करने वाले अपमानजनक व्यवहार ने मंदिर की गरिमा को धूमिल किया। पूरे परिसर में कहीं भी स्पष्ट संकेतक (Signage) नहीं थे, जिससे बुजुर्ग और महिला श्रद्धालु अंधेरे में असहाय नजर आए। अंततः कमांडो को एक असुरक्षित गली में अपनी गाड़ी खड़ी कर आरती में शामिल होना पड़ा, जिससे उनकी मानसिक शांति भंग हो गई।
प्रशासन की इस बड़ी चूक ने यह साफ कर दिया है कि विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग होने के बावजूद यहां की व्यवस्थाएं आज भी 'जुगाड़' और 'सिफारिश' पर टिकी हैं। एक सैनिक जिसने सीमाओं पर देश की रक्षा की, उसे अपने ही आराध्य के द्वार पर सिस्टम की विफलता से जूझना पड़ा। यह घटना उज्जैन मंदिर प्रबंध समिति के लिए एक चेतावनी है कि वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाएं, ताकि भविष्य में किसी अन्य श्रद्धालु को भक्ति के बदले अपमान न सहना पड़े।