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डिजिटल भरोसा न बन जाए जीवनभर की पीड़ा, निजी तस्वीरें साझा करने से बचें : मद्रास हाईकोर्ट

137 पन्नों के आदेश में जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और केके रामकृष्णन ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में कुछ असामाजिक तत्व भरोसे और भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाकर महिलाओं को निजी तस्वीरें/वीडियो साझा करने के लिए उकसाते हैं और फिर ब्लैकमेल करते हैं। इससे पीड़ितों को लगातार शोषण, अपमान और मानसिक आघात झेलना पड़ता है।
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Jul 15, 2026
Madras High Court
Madras High Court

मदुरै. मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा है कि क्षणिक भरोसा कभी जीवनभर की पीड़ा में न बदल जाए। अदालत ने युवतियों और महिलाओं से अपील की है कि वे डिजिटल दुनिया में अपनी निजता और गरिमा की रक्षा के लिए सतर्क रहें।

137 पन्नों के आदेश में जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और केके रामकृष्णन ने कहा कि आज के डिजिटल दौर में कुछ असामाजिक तत्व भरोसे और भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाकर महिलाओं को निजी तस्वीरें/वीडियो साझा करने के लिए उकसाते हैं और फिर ब्लैकमेल करते हैं। इससे पीड़ितों को लगातार शोषण, अपमान और मानसिक आघात झेलना पड़ता है।

अदालत की स्पष्ट टिप्पणीन्यायाधीशों ने कहा, “चाहे प्रेम कितना भी गहरा हो, भरोसा कितना भी मजबूत लगे या गोपनीयता का वादा कितना भी बड़ा हो, निजी तस्वीरें या वीडियो कभी डिजिटल रूप से साझा नहीं करने चाहिए। एक बार नियंत्रण से बाहर जाने पर यह सामग्री आसानी से दुरुपयोग हो सकती है और पीड़िता की निजता, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी असर डाल सकती है।”मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता

अदालत ने यह भी कहा कि किसी महिला जांच अधिकारी को 60 फाइलों में अश्लील सामग्री खंगालनी पड़ी, जिससे उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा। अदालत ने माना कि कोई भी पुलिस या कानूनी प्रशिक्षण इंसान को ऐसे विषैले अनुभवों से मानसिक रूप से सुरक्षित नहीं कर सकता। इसलिए न्यायपालिका और संस्थागत नेतृत्व को अब अनिवार्य मनोवैज्ञानिक जांच, नियमित काउंसलिंग, डिकम्प्रेशन प्रोटोकॉल और कर्मियों का रोटेशन जैसे उपाय अपनाने होंगे।

दोषी की सजा बरकरारयह टिप्पणियां अदालत ने उस समय कीं जब उसने कन्याकुमारी के टी. कासी उर्फ सुजी की अपील खारिज की। नागरकोईल की महिला अदालत ने उसे तीन साल पहले कई महिलाओं से यौन शोषण और धन उगाही के मामले में प्राकृतिक जीवनभर की कैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि उसके खिलाफ मिले सबूत न्यायिक अंतरात्मा को झकझोरते हैं।अदालत ने उसे “आदतन यौन शिकारी” बताते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे मामला साबित किया है, इसलिए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।

Updated on:
15 Jul 2026 05:23 pm
Published on:
15 Jul 2026 05:23 pm