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डिजिटल परिवर्तन का मुख्य आधार है ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’: प्रो. भारद्वाज

पीएम-उषा योजना और एमपीकॉन के सहयोग से तकनीकी विशेषज्ञों ने साझा किए विचार तकनीकी नवाचार और भविष्य की दिशा उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय स्थित कंप्यूटर विज्ञान संस्थान (आईसीएस) में ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का भविष्य: नवाचार और चुनौतियां’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय […]
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Feb 27, 2026
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पीएम-उषा योजना और एमपीकॉन के सहयोग से तकनीकी विशेषज्ञों ने साझा किए विचार

तकनीकी नवाचार और भविष्य की दिशा

उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय स्थित कंप्यूटर विज्ञान संस्थान (आईसीएस) में 'इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का भविष्य: नवाचार और चुनौतियां' विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की 'पीएम-उषा' योजना और एमपीकॉन लिमिटेड, भोपाल के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने डिजिटल युग की बदलती जरूरतों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के संरक्षक और कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने अपने मुख्य उद्बोधन में स्पष्ट किया कि IoT केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि आधुनिक डिजिटल परिवर्तन का सबसे मजबूत आधार है। उन्होंने स्मार्ट सिटी, स्मार्ट हेल्थ और शिक्षा के क्षेत्र में इसकी अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित किया।

कौशल विकास और स्टार्टअप के नए अवसर

संगोष्ठी के दौरान उद्योग और अकादमिक जगत के बीच बढ़ते समन्वय पर जोर दिया गया। कुलसचिव डॉ. अनिल शर्मा ने कहा कि विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए स्वयं को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना होगा। मुख्य वक्ता सुरजीत सिंह गौर (सीईओ) ने स्टार्टअप की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए बताया कि आने वाले समय में स्वचालन (Automation) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का IoT के साथ तालमेल एक नई तकनीकी क्रांति लेकर आएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस त्रिकोणीय संयोजन से न केवल उद्योगों की कार्यप्रणाली बदलेगी, बल्कि रोजगार के हजारों नए अवसर भी सृजित होंगे, जो युवाओं के लिए करियर के नए द्वार खोलेंगे।

सुरक्षा चुनौतियां और शोध की आवश्यकता

जहाँ एक ओर नवाचार की बात हुई, वहीं तकनीकी सीमाओं पर भी मंथन किया गया। मुख्य संयोजक डॉ. उमेश कुमार सिंह ने आगाह किया कि IoT के विस्तार के साथ डेटा सुरक्षा, गोपनीयता (Privacy) और नेटवर्क की विश्वसनीयता जैसी गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. कमल बुनकर ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रायोगिक शिक्षण और निरंतर अनुसंधान को बढ़ावा देने की बात कही। कार्यक्रम की रूपरेखा डॉ. क्षमाशील मिश्रा ने प्रस्तुत की। इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अकादमिक जगत अब केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर भविष्य की तकनीकों को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

Updated on:
27 Feb 2026 08:30 pm
Published on:
27 Feb 2026 08:30 pm