
पश्चिमी सिंहभूम जिले के आनंदपुर और मनोहरपुर प्रखंडों में कोहड़ा यानी कद्दू की खेती कई किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा जरिया बनी है। यहां किसान रबी फसल की कटाई के बाद जल स्रोतों के आसपास की जमीन पर कोहड़ा लगाते हैं। सिंचाई की सुविधा नजदीक होने से पानी की जरूरत और लागत को नियंत्रित करना आसान होता है। दूसरे राज्यों से व्यापारी यहां पहुंचकर फसल खरीदते हैं, जिससे किसानों को स्थानीय बाजार से बाहर भी बिक्री का अवसर मिलता है।
आनंदपुर और मनोहरपुर में कई किसान आलू जैसी रबी फसल की कटाई के तुरंत बाद कोहड़ा की खेती शुरू करते हैं। खास बात यह है कि खेती के लिए ऐसे खेतों को प्राथमिकता दी जाती है, जहां सालभर पानी उपलब्ध रहने वाले जल स्रोत आसपास हों। इससे सिंचाई की सुविधा बनी रहती है और गर्मी के मौसम में भी फसल उगाने में मदद मिलती है।
कृषि विभाग के अनुसार, खेती की नई तकनीकों और बेहतर संसाधनों के इस्तेमाल से किसानों को उत्पादन लागत नियंत्रित करने में मदद मिली है। हालांकि, हर किसान की लागत और कमाई जमीन, मौसम, बीज, श्रम और बाजार भाव के अनुसार अलग हो सकती है।
मनोहरपुर प्रखंड के दुकुरडीह गांव के किसान अशोक महतो इसका एक उदाहरण हैं। 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, वह उस सीजन में करीब 500 क्विंटल कोहड़ा बेच चुके थे और खेत में फसल की तुड़ाई जारी थी। उनका कहना था कि पारंपरिक खेती की तुलना में कोहड़ा की खेती से उन्हें बेहतर आमदनी का अनुभव हुआ।
यह आंकड़ा एक किसान की बिक्री को दर्शाता है, इसलिए इसे हर किसान की संभावित कमाई का पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।
जिला कृषि अधिकारी के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी सिंहभूम के इन इलाकों में छोटे और सीमांत किसान औसतन 15 से 20 टन तक कोहड़ा उत्पादन कर रहे थे, जबकि बड़े किसानों का उत्पादन 50 से 60 टन तक बताया गया।
उत्पादन में इतना अंतर खेती के क्षेत्रफल, पानी की उपलब्धता, बीज, प्रबंधन और तकनीक जैसी परिस्थितियों के कारण हो सकता है। इसलिए केवल उत्पादन के आंकड़े देखकर मुनाफे का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
इस खेती की एक खासियत बाजार से जुड़ी बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पड़ोसी राज्यों से व्यापारी वाहन भेजकर कोहड़ा खरीदने पहुंचते हैं। वजन और भुगतान की प्रक्रिया भी ऑनलाइन किए जाने की बात सामने आई थी, जिससे किसानों को उनके बैंक खाते में सीधे भुगतान मिलता था।
इस तरह किसानों को केवल स्थानीय बाजार पर निर्भर रहने के बजाय बाहरी खरीदारों तक पहुंच मिलती है। हालांकि, कीमत और मांग हर सीजन में बदल सकती है। इसलिए बुवाई से पहले संभावित बाजार और खरीदारों की जानकारी लेना जरूरी है।
जल स्रोतों के पास खेती होने से सिंचाई की लागत कम रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोहड़ा की फसल को हर परिस्थिति में कम पानी ही चाहिए। गर्मी, मिट्टी की नमी, पौधों की अवस्था और जल स्रोत की उपलब्धता के अनुसार सिंचाई की जरूरत बदलती है।
दूसरी चुनौती बाजार भाव है। उत्पादन अच्छा होने के बावजूद यदि बाजार में कीमत गिर जाए या खरीदार उपलब्ध न हों तो किसान की आय प्रभावित हो सकती है। इसलिए पूरी जमीन पर एक ही फसल लगाने के बजाय फसल विविधीकरण और बाजार की पहले से जानकारी लेना जोखिम कम कर सकता है।
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, किसानों को कोहड़ा की खेती के लिए प्रशिक्षण के साथ बीज और सिंचाई के लिए पाइप तथा पंपिंग सेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। इसका उद्देश्य किसानों को बेहतर तकनीक के साथ खेती के लिए प्रोत्साहित करना था।
किसानों को अपने जिले में वर्तमान समय में उपलब्ध योजनाओं और सहायता की जानकारी कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से लेनी चाहिए, क्योंकि सरकारी योजनाओं की पात्रता और सहायता समय के साथ बदल सकती है।
| तरीका | संभावित फायदा |
|---|---|
| रबी फसल के बाद कोहड़ा | खेत का बेहतर उपयोग |
| जल स्रोत के पास खेती | सिंचाई सुविधा |
| प्रशिक्षण और बेहतर तकनीक | लागत व उत्पादन प्रबंधन |
| बाहरी खरीदारों से संपर्क | बाजार का विस्तार |
| ऑनलाइन भुगतान | भुगतान में सुविधा |
| फसल विविधीकरण | बाजार जोखिम कम करने में मदद |
कोहड़ा की खेती पश्चिमी सिंहभूम के कुछ किसानों के लिए अच्छी आय का विकल्प बनी है, लेकिन इसे हर किसान के लिए निश्चित रूप से ज्यादा मुनाफे वाली फसल कहना सही नहीं होगा। जहां पानी की सुविधा, उपयुक्त मिट्टी, पर्याप्त श्रम और बाजार उपलब्ध हो, वहां इसका मॉडल अधिक उपयोगी हो सकता है।
किसान को बुवाई से पहले बीज की गुणवत्ता, सिंचाई, संभावित उत्पादन, स्थानीय बाजार और बिक्री की व्यवस्था का हिसाब लगाना चाहिए। मौसम और बाजार भाव में बदलाव को देखते हुए पूरी खेती को एक ही फसल पर निर्भर करना जोखिम भरा हो सकता है।
पश्चिमी सिंहभूम में कोहड़ा की खेती यह दिखाती है कि पारंपरिक फसल चक्र के बीच सब्जी की खेती को जोड़कर किसान अपनी आय के नए अवसर तलाश सकते हैं। जल स्रोतों के पास खेती, रबी फसल के बाद खेत का उपयोग, कृषि विभाग का प्रशिक्षण और दूसरे राज्यों के खरीदारों तक पहुंच इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएं हैं। लेकिन असली मुनाफा उत्पादन के साथ बाजार भाव और कुल लागत पर निर्भर करेगा।
किसान अपने नजदीकी कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से स्थानीय जलवायु के अनुसार किस्म, बुवाई, सिंचाई और पौध संरक्षण की सलाह लेकर ही बड़े क्षेत्र में कोहड़ा की खेती शुरू करें।