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किशोर कुमार के खंडवा में पैतृक बंगले की दरकती दीवारों के पीछे आज भी जिंदा हैं किशोर दा की यादें

'मेरे घर में तुमको कुछ सामान मिलेगा'... गीत की तरह ही पैतृक बंगले में बिखरी हैं उनकी निशानियां -उनकी मौत के बाद कभी भी वारिसों ने नहीं ली ऐतिहासिक धरोहर की सुध
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Aug 04, 2026
kishore kumar
खंडवा. किशोर कुमार का पैतृक बंगला, जो अब खंडहर बन चुका है।

स्वर सम्राट किशोर कुमार को दुनिया से विदा हुए चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन उनके गीतों में आज भी उनके जीवन की सच्चाइयां झलकती हैं। उनके लोकप्रिय गीत "मेरे घर में तुमको कुछ सामान मिलेगा" की पंक्तियां मानो उनके पैतृक बंगले की वर्तमान स्थिति को बयां करती हैं। खंडवा स्थित इस बंगले की दरकती दीवारों और वर्षों से बंद कमरों के पीछे आज भी किशोर दा की अनगिनत यादें और निजी सामान मौजूद हैं, लेकिन समय, दीमक और बारिश ने इन धरोहरों को काफी हद तक नष्ट कर दिया है।

किशोर के आते ही छा जाती थी रौनक

पिछले 55 वर्षों से किशोर कुमार के बंगले की देखरेख कर रहे चौकीदार सीताराम बताते हैं कि जब भी किशोर दा खंडवा आते थे, पूरा बंगला रौनक से भर जाता था। मित्रों और परिचितों का जमावड़ा लगा रहता था और घर में हमेशा चहल-पहल रहती थी। लेकिन उनके निधन के बाद सब कुछ बदल गया। उनके अनुसार, पिछले 40 वर्षों में बंगले के अंदर के कमरों के ताले तक नहीं खुले, जिससे वहां रखा अधिकांश सामान दीमक और सीलन की भेंट चढ़ गया।

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आज भी बंगले में रखा है उनका सामान

बंगले में आज भी किशोर दा का पैतृक पलंग, अलमारी, आराम कुर्सी, ग्रामोफोन और अन्य निजी वस्तुएं मौजूद हैं। लकड़ी का अधिकांश फर्नीचर पूरी तरह खराब हो चुका है। किशोर दा ने अपने पिता कुंजीलाल गांगुली और माता गौरी देवी के चित्र लंदन से बनवाकर मंगवाए थे। वे तस्वीरें भी बंगले में सुरक्षित रखी गई थीं, लेकिन अब बारिश और सीलन के कारण उनकी हालत भी जर्जर हो चुकी है।

खंडवा में बसने का सपना अधूरा रह गया

सीताराम का कहना है कि किशोर दा खंडवा से बेहद प्रेम करते थे और उनकी अंतिम इच्छा भी यहीं आकर बसने की थी। हालांकि उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर तो खंडवा आया, लेकिन इसके बाद उनके बेटे अमित कुमार और सुमित कुमार सहित परिवार का कोई सदस्य इस बंगले में नहीं पहुंचा। यह बात उन्हें आज भी बेहद पीड़ा देती है।

देशभर से आते हैं प्रशंसक, बंगले की उपेक्षा से दु:खी

हालांकि हर वर्ष किशोर कुमार की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर देशभर से प्रशंसक और कलाकार उन्हें श्रद्धांजलि देने खंडवा आते हैं, लेकिन उनके पैतृक बंगले की उपेक्षा और परिवार की अनुपस्थिति लोगों के मन में कई सवाल छोड़ जाती है। दरकती दीवारों के पीछे आज भी किशोर दा की यादें सांस ले रही हैं और उनकी विरासत संरक्षण की राह देख रही है।

Updated on:
04 Aug 2026 12:24 pm
Published on:
04 Aug 2026 12:24 pm