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संवाद और कूटनीति से परमाणु विवादों का समाधान संभव

इतिहास गवाह है कि परमाणु या संवर्धन केंद्रों पर किए गए हमलों के परिणाम हमेशा आत्मघाती साबित हुए हैं जैसे इराक का ओसिराक रिएक्टर (1981) जब इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हवाई हमला (ऑपरेशन ओपेरा) करके उसे नष्ट कर दिया था। हालांकि वह रिएक्टर पूरी तरह सक्रिय नहीं था, फिर भी इस हमले ने सद्दाम हुसैन को अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह भूमिगत और अधिक गुप्त करने के लिए प्रेरित किया।

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Jun 22, 2026
NuclearSafety
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डॉ. डी.पी.शर्मा
यूनाइटेड नेशंस से जुड़े डिजिटल डिप्लोमेट

हाल ही में सीएनएन द्वारा उजागर किए गए खुफिया दावों ने वैश्विक सुरक्षा के गलियारों में हलचल मचा दी है। इस लीक रिपोर्ट के अनुसार, अमरीकी सेना ईरान के भीतर उसके अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम को जबरन जब्त करने के लिए एक बड़े जमीनी हमले की योजना बना रही थी। इस खतरे को भांपते हुए, तेहरान ने अपनी परमाणु जखीरे की सुरक्षा के लिए न केवल प्रवेश सुरंगों को ध्वस्त कर दिया, बल्कि फोर्डो और नतांज जैसे भूमिगत ठिकानों के रास्तों पर बारूदी सुरंगें (लैंडमाइंस) भी बिछा दीं। हालांकि, भारी जानी-नुकसान और वैश्विक आर्थिक तबाही के डर से इस सैन्य ऑपरेशन को टाल दिया गया, लेकिन इसने यह साफ कर दिया है कि दुनिया सक्रिय परमाणु बुनियादी स्ट्रक्चर पर सीधे सैन्य हमले के कितने करीब पहुंच चुकी थी। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब पारंपरिक युद्ध की नीतियां सक्रिय परमाणु ठिकानों से टकराती हैं, तो मानवता के लिए उसके परिणाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं। एक सक्रिय परमाणु प्रतिष्ठान या यूरेनियम भंडार पर पारंपरिक बमबारी किस कदर विनाशकारी हो सकती है, इसे समझने के लिए हमें वैज्ञानिक और सांख्यिकीय आंकड़ों पर नजर डालनी होगी। ईरान के पास वर्तमान में 60 फीसदी तक समृद्ध यूरेनियम का एक बड़ा भंडार है, जिसे हथियार-ग्रेड (90 फीसदी) तक पहुंचाना बेहद आसान है।

हमलों के परिणाम आत्मघाती
यदि किसी सैन्य हमले में ये कंटेनमेंट स्ट्रक्चर टूटते हैं, तो हवा में यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड (यूएफ 6) जैसी घातक गैसें और रेडियोधर्मी कण फैल जाएंगे। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, एक औसत परमाणु संवर्धन संयंत्र से होने वाला रिसाव तत्काल 50 से 100 किलोमीटर के दायरे को पूरी तरह से निर्जन बना सकता है। हवा के रुख के साथ यह रेडिएशन हजारों किलोमीटर दूर तक फैल सकता है, जिससे आने वाली पीढिय़ां कैंसर, गंभीर जन्मजात विकृतियों और जेनेटिक म्यूटेशन (आनुवंशिक विरूपता) का शिकार होंगी।
इतिहास गवाह है कि परमाणु या संवर्धन केंद्रों पर किए गए हमलों के परिणाम हमेशा आत्मघाती साबित हुए हैं जैसे इराक का ओसिराक रिएक्टर (1981) जब इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हवाई हमला (ऑपरेशन ओपेरा) करके उसे नष्ट कर दिया था। हालांकि वह रिएक्टर पूरी तरह सक्रिय नहीं था, फिर भी इस हमले ने सद्दाम हुसैन को अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह भूमिगत और अधिक गुप्त करने के लिए प्रेरित किया। ईरान के मामले में, सैन्य हमले से परमाणु कार्यक्रम रुकेगा नहीं, बल्कि वह पूरी तरह से अनियंत्रित और अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बाहर हो जाएगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल मार्ग
अन्य घटनाओं में चर्नोबिल (1986) और फुकुशिमा (2011) प्रमुख हैं। ये घटनाएं सैन्य हमले का परिणाम नहीं थीं, बल्कि तकनीकी विफलता थीं। चेरनोबिल आपदा के बाद 30 किलोमीटर के एक्सक्लूजन जोन से 1 लाख से अधिक लोगों को हमेशा के लिए विस्थापित होना पड़ा। फुकुशिमा आपदा के बाद समुद्र में बहे रेडियोधर्मी पानी का असर आज भी साफ़ देखा जा सकता है। जरा सोचिए, यदि कोई महाशक्ति जानबूझकर आधुनिक 'बंकर-बस्टर' बमों से सक्रिय यूरेनियम भंडारों पर हमला करती है, तो रेडियोधर्मी रिसाव का पैमाना चर्नोबिल से कई गुना अधिक भयानक होगा। यदि हम होर्मुज जलडमरूमध्य का गणित समझने की कोशिश करें तो परमाणु रिसाव के अलावा, इस संभावित युद्ध का आर्थिक गणित भी पूरी दुनिया को मंदी की गर्त में धकेलने के लिए काफी है। ईरान की सीमा से सटा होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्त्वपूर्ण तेल मार्ग है। वैश्विक ऊर्जा डेटा के अनुसार, दुनिया के कुल कच्चे तेल के परिवहन का लगभग 20 से 21 फीसदी हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है। इसको यूं समझें कि यदि अमरीका ईरान पर जमीनी हमला करता है तो ईरान जवाबी कार्रवाई में इस जलमार्ग को ब्लॉक करने के लिए अपनी नौसैनिक माइंस का इस्तेमाल कर सकता है।


‘डर्टी बम’ का स्थायी खतरा
ऊर्जा विश्लेषकों का अनुमान है कि होर्मुज जलमार्ग के मात्र कुछ दिनों के लिए बंद होने से भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं, जिससे भारत सहित पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाएगा।
दूसरी तरफ यदि सैन्य हमले के कारण किसी देश की केंद्रीय सत्ता कमजोर होती है जैसा कि 2003 में इराक और 2011 में लीबिया के मामले में देखा गया, तो वहां मौजूद खतरनाक सामग्री पर से सरकार का नियंत्रण खत्म हो जाता है। ईरान के मामले में, कई रिसर्च बताती हैं कि यदि लैंडमाइंस और ढह चुकी सुरंगों के बीच अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम असुरक्षित छोड़ दिया जाता है, तो इसके चोरी होने या ब्लैक मार्केट के जरिए आतंकवादी संगठनों के हाथ लगने का जोखिम 80 फीसदी तक बढ़ जाता है । यह स्थिति दुनिया भर के शहरों के लिए ‘डर्टी बम’ का स्थायी खतरा पैदा कर देगी।

उठाने होंगे कड़े कदम
इस भयावह भविष्य से मानवता को सुरक्षित रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे जैसे सख्त 'नो-स्ट्राइक' कानून। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिनेवा कन्वेंशन की तर्ज पर एक नया वैश्विक समझौता होना चाहिए, जिसके तहत किसी भी सक्रिय परमाणु या यूरेनियम संवर्धन केंद्र पर हमला करने को स्वत: ‘युद्ध अपराध’ का दर्जा दिया जाए। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखकर सदस्य देशों के परमाणु केंद्रों की तकनीकी और स्वतंत्र निगरानी करने का पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए। साल 2015 के ईरान परमाणु समझौते ने यह साबित किया था कि कूटनीति के जरिए ईरान के यूरेनियम संवर्धन को सीमित किया जा सकता है। बल प्रयोग के बजाय, आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने और परमाणु सामग्री को किसी तटस्थ देश (जैसे ओमान या कतर) की निगरानी में सुरक्षित रखने के कूटनीतिक रास्तों को दोबारा जीवित करना होगा।
बहुत ही खतरनाक एवं चिंतनीय सीएनएन की यह रिपोर्ट पूरी दुनिया के लिए एक कड़वी हकीकत और आखिरी चेतावनी है। जब पारंपरिक युद्ध की मिसाइलें समृद्ध यूरेनियम के भंडारों की तरफ बढ़ती हैं, तो वहां किसी की जीत नहीं होती। परमाणु युग में मानव जाति के अस्तित्व की एकमात्र शर्त यही है कि दुनिया ‘सैन्य शक्ति’ के अहंकार को छोडकऱ ‘कूटनीति और संवाद’ के रास्ते को अपनाए।

Published on:
22 Jun 2026 07:28 pm