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आजादी की वह कीमत, जिसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए

14 अगस्त का विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस उन लाखों लोगों के संघर्ष, विस्थापन और बलिदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने 1947 में अपना घर-बार, संपत्ति और अपनों को खोकर स्वतंत्रता की कीमत चुकाई। विभाजन की त्रासदी ने करोड़ों लोगों को विस्थापित किया, लेकिन विस्थापित परिवारों ने मेहनत, आत्मसम्मान, शिक्षा और उद्यमिता के बल पर नए जीवन का निर्माण किया और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस दिवस का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं, बल्कि इतिहास से सीख लेकर सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और मानवीय संवेदना को मजबूत करना है। नई पीढ़ी को समझना होगा कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि हमारे पुरखों के त्याग से मिली अमूल्य विरासत है, जिसकी रक्षा और समृद्धि हमारी जिम्मेदारी है।
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Aug 13, 2026
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हमारे लिए 14 अगस्त केवल भारत के स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या नहीं है। यह भारतीय इतिहास का वह दिन है, जो कि इतिहास में सबसे पीड़ादायक और काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसने स्वतंत्रता की खुशी के साथ करोड़ों भारतीयों के जीवन में ऐसा दर्द भर दिया, जिसकी टीस पीढिय़ों तक महसूस होती रहेगी। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा कर उन लाखों लोगों के संघर्ष, बलिदान और विस्थापन को राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बनाया है, जिन्होंने देश के विभाजन की कीमत अपने घर, जमीन, संपत्ति, परिवार और अपने प्राण देकर चुकाई। विभाजन को समझना केवल इतिहास की एक घटना को समझना नहीं है। बल्कि यह समझना है कि स्वतंत्रता हमें कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी की कीमत चुकाने के बाद मिली है ।
आखिर देश का विभाजन क्यों हुआ?*
यह प्रश्न आज की पीढ़ी के सामने रखा जाना आवश्यक है। भारत का विभाजन किसी एक दिन का निर्णय नहीं था। इसके पीछे कई दशकों की औपनिवेशिक राजनीति, साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था, कतिपय नेताओं के अपने -अपने राजनीतिक हित और महत्वाकांक्षाओं का उभार, हिन्दू-मुस्लिम संबंधों में बढ़ता अविश्वास और अंतत: मुस्लिम लीग द्वारा पृथक राष्ट्र की मांग जैसे अनेक कारण थे। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की विविधताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के ढांचे में इस तरह इस्तेमाल किया कि हमारी सामुदायिक पहचानें धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनती गईं। 1940 के दशक में मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग अधिक मुखर हुई और 1946 के घटनाक्रमों, कैबिनेट मिशन योजना की विफलता और उसके बाद बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को अत्यंत जटिल बना दिया। कलकत्ता, नोआखली, बिहार, रावलपिंडी और पंजाब एवं सिंध सहित अनेक क्षेत्रों में हिंसा ने हमारें अर्वाचीन सामाजिक ताने-बाने को झकझोर दिया। ब्रिटिश सत्ता के शीघ्र हस्तांतरण के निर्णय और सत्ता के विभाजन की प्रक्रिया ने स्थिति को और भयावह बना दिया। अंतत: भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने, लेकिन इसके साथ ही वह मानवीय त्रासदी शुरू हुई, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।
राष्ट्रपितामहात्मा गांधी जीवन भर भारत की एकता और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक रहे। वे विभाजन के घोर विरोधी थे। उन्होंने कहा था कि भारत का विभाजन उनके शरीर को दो टुकड़ों में बांटने के समान होगा। लेकिन हिंसा की विकरालता और गृहयुद्ध की आशंका के सामने परिस्थितियां इतनी भयावह हो गईं कि कांग्रेस नेतृत्व ने अंतत: विभाजन की योजना स्वीकार कर ली।

वह पल जब घर छूटे और जड़ें कट गईं
विभाजन के समय सिंध, पश्चिमी पंजाब, सीमांत प्रांत और पूर्वी बंगाल से भारत आने वाले परिवारों की पीड़ा को केवल आंकड़ों अथवा संख्या में नहीं समझा जा सकता। जिस व्यक्ति का लाहौर, रावलपिंडी, मुल्तान, सियालकोट, पेशावर, कराची, हैदराबाद-सिंध या ढाका में अपना घर था, जिसके पास बड़ी कोठी थी, दुकान थी, खेत थे, कारखाना था, व्यापार था, सामाजिक प्रतिष्ठा थी। वह प्रतिष्ठित व्यक्ति अचानक शरणार्थी बन गया। किसी ने अपनी हवेली का दरवाजा बंद किया और सोचा कि कुछ दिनों में लौट आएंगे। किसी ने दुकान की चाबी पड़ोसी को सौंपते हुए कहा कि जल्द वापस आएंगे। किसी ने खेत की मिट्टी माथे से लगाई। किसी मां ने बच्चों का हाथ पकड़ा और बिना यह जाने चल पड़ी कि आगे उनका ठिकाना कहां होगा लेकिन वे लौट नहीं सके। पीछे रह गए घर, मंदिर, गुरुद्वारे, बाजार, खेत, दुकानें, रिश्तों की स्मृतियां और पीढिय़ों की जमा पूंजी। आगे था एक अनिश्चित भविष्य। विभाजन के कारण करोड़ों लोग विस्थापित हुए और यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी अथवा कहें जन-प्रवासों भी भयानक घटनाओं में से एक बन गया। हिंसा, हत्या और विस्थापन की अवर्णनीय घटनाओं ने लाखों परिवारों को तहस-नहस कर दिया।
खून से सनी रेलगाडिय़ां और इंसानियत का टूटना
विभाजन की सबसे भयावह स्मृतियों में शरणार्थी रेलगाडिय़ां भी हैं। लोग यह विश्वास लेकर ट्रेन में बैठते थे कि वे सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाएंगे, लेकिन कई रेलगाडिय़ां अपने गंतव्य तक पहुंचीं तो उनमें जीवित यात्रियों की जगह शव थे। पंजाब की धरती पर चलने वाली इन ट्रेनों ने इतिहास के सबसे भयावह दृश्य देखे। हिंसा के दौर में यात्रियों से भरी रेलगाडिय़ों पर हमले हुए और हजारों लोग मारे गए। विभाजन के दौरान ‘ब्लड ट्रेन’ की स्मृतियां आज भी अनेक परिवारों की मौखिक इतिहास परंपरा का हिस्सा हैं। सबसे अधिक मर्मांतक पीड़ा महिलाओं ने झेली। अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन, जबरन विवाह और परिवारों से बिछुडऩे जैसी अमानवीय घटनाएं बड़े पैमाने पर हुईं। इतिहास के दस्तावेज और पीडि़त महिलाओं की गवाहियां इस त्रासदी की भयावहता को सामने लाती हैं। यह स्मरण किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए होना चाहिए कि जब समाज में नफरत, अविश्वास और हिंसा का जहर फैलता है तो सबसे पहले इंसानियत हारती है।
विभाजन की पीड़ा का दंश मेरे परिवार ने भी झेला
भारत के विभाजन की त्रासदी केवल इतिहास की किताबों में दर्ज कोई घटना नहीं है। यह करोड़ों परिवारों की ऐसी जीवित स्मृति है, जिसकी पीड़ा पीढिय़ों तक महसूस की जा रही है। मेरा परिवार भी उन लाखों सिंधी परिवारों में शामिल था, जिन्हें 1947 में अपना घर-बार, जमीन-जायदाद और कारोबार छोडकऱ शरणार्थी के रूप में भारत आना पड़ा था । मेरे परिवार का मूल संबंध सिंध के टंडो आदम से था। मेरे बाबा श्री भवन दास का वहां घर, जमीन और अनाज का अच्छा-खासा कारोबार था लेकिन देश के विभाजन के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि परिवार को सब कुछ छोडकऱ सिंध से पलायन करना पड़ा। परिवार ने विस्थापन की वह पीड़ा झेली, जिसमें अपने ही देश में रातों-रात बेघर हो जाना पड़ा और जीवन की सारी जमा-पूंजी पीछे छूट गई। मेरे परिवार को विभाजन का एक और गहरा घाव यह मिला कि मेरे नाना और एक मामा सिंध में ही रह गए। मेरा परिवार जिन परिस्थितियों और कठिनाइयों से गुजरा है उसमें विभाजन का दर्द मुझे और मेरे परिवार को आज भी विचलित करता है, क्योंकि भारत पाक के मध्य सीमा रेखा खिंच गई, लेकिन सिंध में छूट गए हमारे अपनों रिश्तों के बीच खिंची वह रेखा आज तक मन से नहीं मिट सकी है। मेरे पिताजी को भारत आने के बाद अपना और अपने परिवार का जीवन फिर नए सिरे से शुरू करना पड़ा। कभी कागज की थैलियां और चने बेचकर परिवार ने गुजारा किया। बाद में मेरे पिता भवन दास ने डाकघर में चपरासी के रूप में काम किया और आगे चलकर पोस्टमास्टर के पद तक पहुंचे। मुझे स्मरण है कि मैंने स्ट्रीट लाइटों के नीचे बैठ कर अपनी पढ़ाई की थी ।

विस्थापित हुए, लेकिन टूटे नहीं
भारत पाकिस्तान विभाजन के कारण करीब दो करोड़ लोग विस्थापित हुए और लगभग बीस लाख लोग मारे गए। विभाजन के बाद भारत आए सिंधी, पंजाबी और अन्य विस्थापित परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी। शून्य से अपना जीवन शुरू करना। जिनके पास पाकिस्तान में बड़े मकान और कारोबार थे, वे भारत में कभी तंबुओं में रहे, कभी शरणार्थी शिविरों में तो कभी खुले गगन के तले रातें बिताने को मजबूर होना पड़ा। कई परिवारों ने छोटी-सी दुकान से अपनी आजीविका के नए सफर की शुरुआत की तो किसी ने सडक़ किनारे व्यापार शुरू किया, किसी ने नौकरी की, किसी ने ठेला लगाया, किसी ने छोटा नया उद्योग खड़ा किया। लेकिन जीवन की भयंकर त्रासदी से गुजरने के बावजूद उन्होंने किसी के आगे हाथ फैलाकर जीवन बिताने के बजाय मेहनत, आत्मसम्मान, उद्यमिता और शिक्षा को अपना हथियार बनाया। यही उनकी सबसे बड़ी विजय थी। यह संघर्ष केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों विस्थापित परिवारों की कहानी है, जिन्होंने अपनी मेहनत, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति आस्था के बल पर राख से अपना नया संसार खड़ा किया। उन्होंने विस्थापन को अपनी नियति मानकर जीवन से हार नहीं मानी। विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया, नए भारत में अपना स्थान बनाया और राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। यही विभाजन पीडि़त परिवारों की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने अपना अतीत खोया, लेकिन भविष्य बनाने का संकल्प नहीं खोया। आज भारत के व्यापार, उद्योग, सेवा, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, लघु एवं बड़े उद्यमों तथा कर व्यवस्था में सिंधी और पंजाबी समाज के लोगों का उल्लेखनीय योगदान दिखाई देता है। जिन परिवारों ने विभाजन में सब कुछ खो दिया था, उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संपत्ति छीनी जा सकती है, लेकिन प्रतिभा, परिश्रम, साहस और आत्मसम्मान नहीं छीना जा सकता।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: घाव कुरेदना नहीं, घाव भरना है
हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी है जिनकी पहल पर केन्द्र सरकार ने प्रतिवर्ष 14 अगस्त को च्विभाजन विभीषिका स्मृति दिवसज् के रूप में मनाने का निर्णय लिया । यह केवल अतीत को याद करना नहीं है। इसका उद्देश्य उन परिवारों के दर्द को राष्ट्रीय स्मृति में स्थान देना है, जिनकी पीड़ा लंबे समय तक केवल व्यक्तिगत स्मृतियों और परिवारों की कहानियों तक सीमित रही। आज जब 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है, तब विस्थापित परिवारों की जुबानी उन असंख्य अनकही कहानियों की प्रतिनिधि बन जाती है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया। विभाजन की इस पीड़ा को स्मरण करना किसी समुदाय के
प्रति वैमनस्य पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों को यह समझाने के लिए आवश्यक है कि सामाजिक सद्भाव, भाईचारा और राष्ट्रीय एकता कितनी अनमोल है। विभाजन की विभीषिका हमें यही संदेश देती है कि नफरत की राजनीति अंतत: समाज को बांटती है, जबकि संवाद, विश्वास और एकता राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं।
यह स्मृतियां हमें बताती है कि आजादी का उत्सव जितना गौरव का विषय है, उतना ही विभाजन की पीड़ा को याद करना हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस दिवस का उद्देश्य वर्तमान और भावी पीढिय़ों को विभाजन के दर्द और विस्थापित लोगों के संघर्ष से परिचित कराना है। साथ ही, सामाजिक सद्भाव, एकता और मानवीय संवेदना को भी मजबूत करना है। यह दिवस हमें बताता है कि इतिहास को भूलना समाधान नहीं है। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है ताकि वही गलतियां दोबारा न हों सके।
नई पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा संदेश
आज हमारे बच्चे और युवा एक स्वतंत्र भारत में जन्म लेते हैं। उनके लिए सीमा, संसद, संविधान, लोकतंत्र और तिरंगा तथा पासपोर्ट आदि स्वाभाविक चीजें हैं लेकिन उनके पुरखों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति पाना मात्र नहीं था। स्वतंत्रता के साथ उन्हें अपना घर छोडऩा पड़ा। अनेक दर्दनाक घटनाओं को देखना पड़ा। किसी ने अपनी मां खोई। किसी ने पिता खोया। किसी ने अपना भाई खोया और पत्नी खोई। किसी की बहन रास्ते में बिछुड़ गई। किसी ने अपनी पूरी संपत्ति पीछे छोड़ दी और किसी ने अपनी आंखों के सामने अपना संसार उजड़ते देखा। इसलिए जब आज की पीढ़ी 15 अगस्त को जब तिरंगा फहराए तो उसे केवल इसे उत्सव नहीं, वरन् कृतज्ञता का पर्व भी समझना चाहिए। उसे याद रखना चाहिए कि यह आजादी हमें उनके पुरखों के त्याग और कई प्रकार के कष्ट उठाने और लाखों ज्ञात-अज्ञात बलिदानों के कारण मिली है। विभाजन की पीड़ा हमें यह संकल्प लेने को प्रेरित करती है कि हम भारत को कभी ऐसी परिस्थितियों में नहीं जाने देंगे जहां धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के नाम पर इंसान-इंसान का दुश्मन बन जाए। हमारी शक्ति हमारी विविधता में है। हमारी पहचान हमारी एकता है। हमारा भविष्य सामाजिक सद्भाव में है। 14 अगस्त जहां हमें विभाजन की पीड़ा याद दिलाता है वहीं 15 अगस्त हमें एक विकसित भारत ञ्च2047 के निर्माण का संकल्प देता है। आइए, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर हम अपने उन पुरखों को नमन करें जिन्होंने सब कुछ खोकर भी भारत को अपना घर बनाया, संघर्ष किया, मेहनत की और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया। उनके त्याग को याद करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि आप आजादी को केवल अपने अधिकार के रूप में मत देखिए, बल्कि इसे अपने पुरखों की अमूल्य विरासत समझिए,क्योंकि जिस स्वतंत्रता के लिए एक पीढ़ी ने अपना घर संसार छोड़ा था, उसे सुरक्षित और समृद्ध बनाना हमारी पीढ़ी का दायित्व है। इसलिए विभाजन की विभीषिका को याद रखें, लेकिन उससे घृणा नहीं बल्कि, राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और अखंड भारत एवं राष्ट्रीय चेतना की प्रेरणा लें।यही उन लाखों विस्थापितों और बलिदानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Updated on:
13 Aug 2026 07:25 pm
Published on:
13 Aug 2026 07:24 pm