
भारत भूमि का सौभाग्य है कि यहां वैचारिक दृष्टि से 'बहता पानी निर्मला' है। जब-जब भी यहां सामाजिक-सांस्कृतिक विषमताएं और यहां तक कि राजनीतिक चुनौतियां भी आईं तो भारतीय समाज के भीतर से ही उसके निराकरण हुए और झंझावात से उपजे प्रदूषण को दूर करने के लिए सफल सामाजिक आंदोलन हुए। इस तरह विचारों का परिमार्जन निरंतर होता रहा।अकादमिक इतिहास की दृष्टि से मध्यकाल कहे जाने वाले काल में भक्ति आंदोलन भी ऐसा ही सामाजिक-आध्यात्मिक प्रयास था जिसने भारतीय समाज को वैचारिक निर्मलता तो प्रदान की ही, साथ ही तत्कालीन स्थितियों के लिए युग धर्म सिखाते हुए संगठित भी रखा। समाज में उस समय अनेक महान संत हुए जिन्होंने दिग्भ्रमित और सांस्कृतिक आक्रमण से आहत समाज को दिशा प्रदान की। उस समय की संत शृंखला में संत शिरोमणि रविदास हुए जो लोक मानस में 'रैदास' के रूप में भी जाने जाते हैं।
देश भर में संत रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष पर अनेक आयोजन किए जा रहे हैं। उनका व्यक्तित्व आडंबर रहित जीवन और समतामूलक समाज के लिए उदाहरण है। वे वैष्णव भक्तिधारा के संत रामानंदाचार्य के शिष्य थे। वे कबीर के समकालीन थे, गुरु भाई थे। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' उनका दिया ऐसा बीज सूत्र है, जो जीवन में आचरण की शुद्धता के गहन दर्शन की अभिव्यक्ति तो है ही, साथ ही सभी तरह के बाहरी दिखावे को अनावश्यक सिद्ध कर देता है। इस पंक्ति का सार तत्व यह है कि इस सूत्र ने तत्कालीन हिंदू समाज को समरस और एकजुट होने का आधार प्रदान किया। सिकंदर लोदी के समय हिंदू रीति-रिवाजों, तीर्थयात्रा, पूजा-पाठ आदि पर जजिया कर से त्रस्त समाज के लिए भक्तिके सरलीकरण का यह संबल अत्यावश्यक था ताकि समाज विपरीत वैचारिक धारा में टिके रहने का साहस जुटा सके। राजस्थान से उनका विशेष नाता है। वह मीरा बाई के वे गुरु थे और कहते हैं कि जिस मूर्ति की वे पूजा करती थीं वह भी रविदास ने ही उन्हें दी। चित्तौडग़ढ़ के किले में मीरा बाई मंदिर के पास 'रैदास की छतरी' भी है। उनके जीवन से जुड़े अनेक चमत्कारिक आख्यान ने उनके अनुयायियों की संख्या भी खूब बढ़ाई। इससे प्रभावित होकर उन्हें मतांतरित करने के प्रयास भी हुए, परंतु उन्होंने जनजागरण कर इन प्रयासों को विफल किया। 'रैदास रामायण' में उन्होंने लिखा- 'वेद धरम छोड़ूं नहीं, कोसिस करो हजार।' उनकी साधना ने ऐसे प्रयास करने वालों को ही उनका अनुयायी बना दिया। आडंबरयुक्त कर्मकांड और जातिगत भेदभाव के स्थान पर उन्होंने धर्म का पालन करने, श्रेष्ठ कर्म करने और समाज में समानता का भाव रखने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि 'रैदास जनम के कारणे, होत न कोई नीच, नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच।' उस समय समाज में दुख, राग-द्वेष, जातिगत टकराव आदि से रविदास दुखी थे। उनकी रचनाओं से भी यह स्पष्ट होता है। वे लिखते हैं -'जात पात के फेर महि, उरिझ गई सब लोग, मनुषता को खात है, रविदास जात का रोग।' उस समय समाज में व्याप्त विपन्नता भी उन्हें खलती थी। रविदास की रचनाओं में इसका उल्लेख मिलता है जहां वे लिखते हैं- 'ऐसा चाहूं राज मैं ,जहां मिले सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसे, रविदास रहे प्रसन्न।'
कर्मों की श्रेष्ठता को उन्होंने अपने जीवन से स्थापित किया। 'अंतर घट खोजि कै, जहां तहं राम बसै' जैसे अनेक पदों के माध्यम से उन्होंने वेद-उपनिषदों का सार लोक भाषा में समझाया। यही भारतीय दर्शन की वह शाश्वत अभिव्यक्ति है जो रविदास जैसे संतों के कारण जीवंत है।