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भुगतान होने के बाद दूसरे दिन दिया पिता का शव, अब राहत राशि भी डकार गया अस्पताल प्रबंधन

इलाज के दौरान पिता की 9 मई 2023 की शाम 4 बजे अस्पताल में मौत हो गई, लेकिन जब तक हमने बकाया बिल का भुगतान नहीं किया तब तक प्रबंधन ने उनके शव को आइसीयू से भी बाहर नहीं निकाला। रात 12 बजे के बाद जब हमने यहां-वहां से मदद मांग भुगतान पूरा किया तब कहीं जाकर दूसरे दिन हमें पिताजी का शव सौंपा गया।

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Jul 08, 2024
भुगतान कराने के बाद दिया पिता का शव


विधवा मां और अनाथ हुई बेटियों का दर्द : एक साल से अस्पताल और कलेक्टर कार्यालय के चक्कर काट रही बेटी, घर में कमाने वाला भी कोई नहीं

सागर. इलाज के दौरान पिता की 9 मई 2023 की शाम 4 बजे अस्पताल में मौत हो गई, लेकिन जब तक हमने बकाया बिल का भुगतान नहीं किया तब तक प्रबंधन ने उनके शव को आइसीयू से भी बाहर नहीं निकाला। रात 12 बजे के बाद जब हमने यहां-वहां से मदद मांग भुगतान पूरा किया तब कहीं जाकर दूसरे दिन हमें पिताजी का शव सौंपा गया। इसके बाद मुख्यमंत्री राहत कोष से मिली 60 हजार रुपए की सहायता राशि भी अस्पताल प्रबंधन हड़प गया है। यह कहना पिता की मौत के बाद अनाथ हुई खुरई के दीनदयाल उपाध्याय वार्ड निवासी 23 वर्षीय हर्षिता श्रीवास्तव का। हर्षिता ने बताया कि मोबाइल पर सहायता राशि स्वीकृत होने के बाद हमने कलेक्टर कार्यालय से पता किया तो राशि अस्पताल के बैंक खाते में गई है। इसके बाद यह राशि वापस लेने एक साल से चक्कर काट रही हूं। अस्पताल प्रबंधन बात सुनने तैयार नहीं है तो प्रशासनिक स्तर पर भी कोई मदद नहीं मिल रही है।

कलेक्टर से की गई शिकायत में हर्षिता ने बताया कि उनके पिता ललित श्रीवास्तव को लीवर सहित पेट की बीमारियां थीं। उनकी हालत बिगड़ी तो परिवार ने 2 मई 2023 को मकरोनिया के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। इलाज के दौरान 9 मई की शाम उनकी मौत हो गई। इसके बाद अस्पताल ने 1.18 लाख रुपए का बिल दिया। पहले से जमा रुपए और 7 हजार का डिस्काउंट करते हुए 89 हजार रुपए हमने जमा कर दिए थे। इसके प्रमाण भी हर्षिता ने उपलब्ध कराए हैं।

- घर में कमाने वाला कोई नहीं

हर्षिता ने बताया कि पिताजी के जाने के बाद घर में मां और हम तीन बहनें बचे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। छोटी बहन पढ़ाई कर रही है तो बड़ी बहन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है। मेरी नौकरी से जो वेतन मिलता है उसी से परिवार चला रही हूं। इसके अलावा दो एकड़ जमीन है तो कुछ रुपए उससे मिल जाते हैं।

- आखिरी दिन छिपाते रहे स्थिति

हर्षिता का आरोप है कि उनके पिता की हालत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन अस्पताल प्रबंधन हमें लगातार गुमराह करता रहा। उन्हें केवल बिल भुगतान से मतलब था। वे बार-बार बोलते थे कि आप तो रुपयों की व्यवस्था करो यहां मरीज की देखभाल अस्पताल कर लेगा। आखिरी दिन सुबह पिताजी को आइसीयू में भर्ती किया और शाम तक हम लोगों को अंदर नहीं जाने दिया। इसके बाद शाम को अचानक हमें बताया कि उनके पास थोड़ा-बहुत समय है आप लोग जाकर मिल लो। हर्षिता ने पिता की मौत की वजह अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही बताई है, उनका कहना है कि अस्पताल को केवल रुपयों से मतलब रहा।

- प्रबंधन का कहना पुराना बकाया था

मामले को लेकर हमने अस्पताल प्रबंधन से बात की तो उनका कहना था कि मरीज का पूर्व में इलाज हुआ था उसका 45 हजार रुपए बकाया था। सीएम राहत कोष मिली राशि में से बकाया राशि काटकर बाकी बची रकम उन्हें देने तैयार हैं, लेकिन परिवार पूरे 60 हजार रुपए की मांग कर रहा है। अस्पताल के जनरल मैनेजर ने से हमने बकाया होने के प्रमाण मांगे तो उनका जवाब था अभी बाहर हूं बाद में आप अपने प्रतिनिधि को भेज दें तो उपलब्ध करा दिए जाएंगे।

Updated on:
08 Jul 2024 11:33 am
Published on:
08 Jul 2024 11:32 am
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