एवरेस्ट फतह करने की दीवानगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 71 वर्षों में 6400 से ज्यादा पर्वतारोहियों ने चढ़ाई की, जिसमें 80 फीसदी तो वर्ष 2000 के बाद चढ़े।
नई दिल्ली. कभी साहस की कहानियों से आबाद रहने वाला माउंट एवरेस्ट अब सैलानियों के शोर से कराह रहा है। ऊंचाई वही है, पड़ाव वैसे ही हैं, मौसम की चुनौतियां भी वैसी ही हैं, लेकिन व्यावसायीकरण की होड़ और रोमांच की चाह ने जोखिमभरी यात्रा को पर्यटन में तब्दील कर दिया। ढेरों ट्रेङ्क्षकग कंपनियां आपके इशारे का इंतजार कर रही हैं, शेरपा तैयार बैठे हैं..। सुरक्षा बंदोबस्त और ट्रेकिंग डिवाइसेज ने यात्रा को अपेक्षाकृत सुरक्षित बना दिया है। यही वजह है शुुरुआती वर्षों में पर्वतारोहियों की संख्या बमुश्किल दहाई तक पहुंच पाती थी, अब कई सौ पार हो गई। एवरेस्ट फतह करने की दीवानगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 71 वर्षों में 6400 से ज्यादा पर्वतारोहियों ने चढ़ाई की, जिसमें 80 फीसदी तो वर्ष 2000 के बाद चढ़े। इस जुनून की कीमत हिमालय को ही चुकानी पड़ रही है। पर्वतारोही हर वर्ष टनों कचरा छोड़ रहे हैं, जिससे बर्फ में जहरीले कैमिकल तक पनप रहे हैं। 29 मई 1953 को न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के शेरपा तेनजिंग ने पहली बार एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे थे। इसकी स्मृति में 2008 से हर साल 29 मई को अंतरराष्ट्रीय एवरेस्ट दिवस मनाया जाता है।
71 वर्षों में क्या-क्या बदला
महीनों लंबी यात्रा कुछ दिनों तक सिमटी: एवरेस्ट क्षेत्र के प्रवेशद्वार लुक्ला में 1964 में हवाई पट्टी के निर्माण के बाद आधार शिविर तक महीनों लंबी यात्रा अब महज 10 से 15 दिनों
तक सिमट गई है।
संचार और खान-पान बदला : पहले पर्वतारोही डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर निर्भर थे। अब ताजा सलाद, पके हुए खाद्य पदार्थ और कॉफी उपलब्ध हैं। बेसकैंप पर भारी भरकम सैटेलाइटट फोन की जगह वाइ-फाइ तक उपलब्ध है।
क्या हो रहा नुकसान
दोगुना तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर: 2019 के एक अध्ययन में बताया गया कि हिमालय के ग्लेशियर पिछली सदी की तुलना में दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं। हिम दरारें चौड़ी हो रही हैं। ग्लेशियर पिघलने से झीलों की संख्या बढ़ रही है।
लग रहा कचरे का अंबार: 2018 के एक अध्ययन में सामने आया कि यात्रा में प्रतिदिन 4.6 टन ठोस कचरा छोड़ा जाता है। नेपाल की पहल पर रिसाइकल शुरू हुआ, लेकिन 30त्न ही हो पाता है। कचरे के कारण पानी और बर्फ में माइक्रोप्लास्टिक मिले।
बड़ी वजह: नेपाली अर्थव्यवस्था की निर्भरता
माउंट एवरेस्ट से नेपाल की अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है, वहीं स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी है। नेपाली सरकार ने परमिट की संख्या बढ़ा दी। इस साल सिर्फ एवरेस्ट परमिट शुल्क में ही 50 लाख डॉलर से ज्यादा की कमाई की है। नेपाल में 10 फीसदी से ज्यादा लोग पर्यटन से जुड़े हैं।