
भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। पहले पश्चिम एशिया में तनाव से पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति शृंखला पर संकट खड़ा हुआ, तो अब 'अल नीनो' के प्रभाव से कमजोर मानसून ने चिंता बढ़ा दी है। गनीमत है कि पश्चिम एशिया संकट अब खत्म होता प्रतीत हो रहा है और कच्चे तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्थिति में आ गई हैं। लेकिन, दूसरी चिंता बरकरार है। भारत में कुल वार्षिक वर्षा का औसतन 70 फीसदी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है, जो 300 अरब डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। मौसम विभाग ने इस बार 24 फीसदी कम बारिश की आशंका जताई है। जुलाई में इसकी भरपाई नहीं हुई तो अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर होगा। बारिश में 10 फीसदी की कमी से खाद्य पदार्थों में होने वाली महंगाई के कारण मुद्रास्फीति दर में एक फीसदी की वृद्धि हो सकती है। ऐसे में ग्रामीण खर्चों में कमी का नकारात्मक असर शेयर बाजारों के साथ-साथ त्योहारी सीजन को भी गिरफ्त में ले लेता है, जो अंतत: औद्योगिक मांग में कमी के कारण संपूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
वैसे, एक खतरा तो यह भी है कि देर से आया मानसून यदि सितंबर-अक्टूबर तक आगे बढ़ गया, तो कटाई के समय फसलों को बर्बाद करके रही-सही कसर भी पूरी कर देगा। राहत की बात यह है कि देश में अनाज का भरपूर भंडार है। लेकिन बफर स्टॉक केवल गेहूं और चावल के लिए होता है; दलहन, तिलहन या मोटे अनाजों का ऐसा कोई बफर स्टॉक नहीं रखा जाता। महंगाई में आग लगाने में इन्हीं की ज्यादा भूमिका होती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अल नीनो का प्रभाव भारत में ही नहीं होगा, बल्कि यह उन देशों को भी अपनी चपेट में लेगा जहां से हम खाद्य तेल इत्यादि वस्तुओं का आयात करते हैं।
यह बात सही है कि सरकार ने मौसम की इस चुनौती से निपटने की तैयारी शुरू कर दी है, पर कहना मुश्किल है कि वह वास्तव में कितनी प्रभावी होगी। अनुभव यही रहे हैं कि प्राकृतिक आपदाओं में सरकारी उपाय या तो 'ऊंट के मुंह में जीरा' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। जाहिर है वहां सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था आनन-फानन में तो हो नहीं सकती। ऐसे दौर में कम पानी वाली फसलों का चयन करना और किसानों को आपातकालीन उपायों की जानकारी देना ही फौरी कदम हो सकते हैं। लेकिन इससे कितना सहयोग मिलेगा, यह कहना कठिन है। वैसे भी आमतौर पर सरकारी तंत्र का पूरा ध्यान आखिर में मुआवजा देने-दिलाने की प्रक्रिया तक सिमट जाता है, क्योंकि यहीं पर भ्रष्टाचार की लताएं पुष्पित व पल्लवित होती हैं। अन्य उपाय करने के साथ-साथ किसानों को मौसम की मार से बचाने के साथ-साथ, स्टॉक रोककर मुनाफा कमाने वाले कारोबारियों पर भी सरकार को कड़ी नजर रखनी होगी।