प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत के सहयात्री इजरायल के साथ अपनी मित्रता दोहराते हुए वैश्विक नेतृत्व का प्रदर्शन किया। साथ ही उन्होंने विश्व को यह संदेश दिया कि अब समय पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर 21वीं सदी की भू-राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप नई दृष्टि अपनाने का है।
अरुण जोशी, दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि यह ऐसे समय में हुई जब विश्व अनेक संकटों से जूझ रहा है। यही कारण है कि यह यात्रा असाधारण मानी गई। यह वैश्विक मामलों में नेतृत्व के प्रदर्शन के अनुरूप एक साहसिक कदम थी। प्रधानमंत्री वहां गए, जहां जाने से अन्य देश हिचक रहे थे।
संशयवादियों के बीच अमरीका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा गाजा शांति योजना को लेकर संदेह उपज रहे थे। प्रश्न उठ रहे थे कि जब अमरीका ईरान पर हमला कर सकता है और इजरायल फिलिस्तीनियों के साथ संघर्ष में उलझा है, तब मोदी ऐसे देश की यात्रा का जोखिम क्यों ले रहे हैं? लेकिन यात्रा के बाद स्थिति स्पष्ट है। प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत के सहयात्री इजरायल के साथ अपनी मित्रता दोहराते हुए वैश्विक नेतृत्व का प्रदर्शन किया। साथ ही उन्होंने विश्व को यह संदेश दिया कि अब समय पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर 21वीं सदी की भू-राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप नई दृष्टि अपनाने का है। देश के भीतर भी इस यात्रा ने फिलिस्तीन समर्थन और दो-राष्ट्र समाधान की पुरानी धारणाओं का राग अलापते रहे विपक्ष को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत 20वीं सदी की जड़ विचारधाराओं का बंधक बनकर नहीं रह सकता। मोदी की इजरायल यात्रा ने तीन स्पष्ट और प्रभावशाली संदेश दिए। पहला, भारत आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में इजरायल के साथ खड़ा है। 25 फरवरी को इजरायली संसद में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने सात अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए आतंकी हमले की निंदा की, जिसमें 1200 नागरिक मारे गए थे। उन्होंने कहा, 'कहीं भी आतंक शांति के लिए हर जगह खतरा है।'
लंबे समय से आतंकवाद का शिकार रहे इजरायल के प्रति भावनात्मक एकात्मता प्रकट करते हुए मोदी ने कहा- 'मैं भारत की जनता की ओर से हर उस जीवन के लिए गहरी संवेदना लेकर आया हूं जो सात अक्टूबर के बर्बर आतंकी हमले में खो गया। जिन परिवारों की दुनिया उजड़ गई, उनके दुख को हम महसूस और साझा करते हैं। इस क्षण में और आगे भी, भारत पूरी दृढ़ता के साथ इजरायल के साथ खड़ा है।' दूसरा संदेश रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को लेकर था। इन क्षेत्रों में इजरायल की उपलब्धियों को देखते हुए संबंधों को सामरिक साझेदारी तक ले जाने की दिशा में रक्षा, नवाचार और साइबर सुरक्षा से जुड़े समझौते महत्वपूर्ण कदम हैं। तीसरा, यह भारत की सामरिक स्वायत्तता की सशक्त अभिव्यक्ति थी। आज का भारत कुछ वर्ष पूर्व के भारत से भिन्न है। वह अब किसी के नेतृत्व के अधीन नहीं, बल्कि अनेक क्षेत्रों में विश्व का नेतृत्व कर रहा है। एशिया में वह चीन का संतुलन मात्र नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरी व्यवस्था में अमरीका का पूर्ण नियंत्रण अब संभव नहीं। सीमापार आतंकवाद का निर्यातक पाकिस्तान, विशेषकर चीन से आधुनिक हथियार और तकनीक प्राप्त कर रहा है। ऐसे में भारत को दूसरों की राय की परवाह किए बिना अपने हितों की रक्षा करनी होगी।
कुछ आलोचक गाजा में इजरायल की कार्रवाई और दो-राष्ट्र समाधान पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर प्रश्न उठाते हैं। किंतु यह मौन भी एक संदेश था कि सात अक्टूबर का हमला मूल कारण था और आतंकवाद को किसी राजनीतिक समाधान का औजार नहीं बनाया जा सकता। दो स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्रों-फिलिस्तीन और इजरायल-का समाधान आतंक की राह से नहीं निकल सकता। भारत आतंकवाद के विरुद्ध सशक्त स्वर है और अपने राष्ट्रीय हितों के प्रति सजग है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत का रुख साफ है- आतंकवाद और आतंकियों के साथ कोई समझौता नहीं।