
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर उस सच को उजागर कर दिया है जिसकी सिस्टम लंबे समय से अनदेखी करता आ रहा है। रेत के अवैध खनन को लेकर कोर्ट ने राजस्थान और मध्यप्रदेश के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि 'यह सब आपकी नाक के नीचे हो रहा है लेकिन अधिकारी झूठे हलफनामे दे रहे हैं।' चम्बल अभयारण्य क्षेत्र में रेत के अवैध खनन के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मध्यप्रदेश के मुरैना में वन आरक्षक की ट्रैक्टर से कुचलकर हुई मौत और अवैध खनन जारी रहने को लेकर जो कुछ कहा वह सरकारों को चेताने वाला है। कोर्ट ने साफ कहा कि 'अगर कोई राज्य अपने अधिकारियों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर सकता तो उसके होने का औचित्य ही क्या है?' हैरत की बात यह कि मध्यप्रदेश सरकार तो कोर्ट के सम्मुख यह स्वीकार कर चुकी है कि रेत के अवैध खनन माफियाओं से मुकाबला करने के लिए सुरक्षा बंदोबस्त पूरे नहीं हैं।
इससे पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) भी नदी की तह में जाकर मशीनों के जरिए रेत खनन पर रोक लगा चुका है, लेकिन हर साल दर्जनों ऐसी मशीनें नदी की छाती चीरने उतर जाती हैं। चंबल के पुलों के नीचे हो रहा खनन केवल पर्यावरण के लिए संकट ही नहीं बल्कि रेलवे और सड़क पुलों की संरचनात्मक सुरक्षा को भी खतरे में डालने वाला है। दरअसल, रेत का कारोबार अब 'सफेद सोना' बन चुका है। निर्माण कार्यों की बढ़ती मांग ने इसे इतना लाभकारी बना दिया है कि माफियाओं ने इसे संगठित अपराध का रूप दे दिया है। पनडुब्बियों से खनन जैसे तरीके इस बात का संकेत हैं कि तकनीक का इस्तेमाल अब कानून को दरकिनार करने के लिए भी हो रहा है। सवाल यह है कि जब अदालत और एनजीटी जैसे संस्थान स्पष्ट आदेश दे चुके हैं, तो फिर यह काला कारोबार किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है? मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों ही राज्यों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां कार्रवाई की खानापूर्ति तो होती है पर समस्या जस की तस बनी रहती है। यह भी विडंबना है कि जिन अफसरों पर निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी है, उन्हीं की भूमिका पर सवाल खड़े होते रहे हैं।
समस्या के समाधान की दिशा में पहला और सबसे जरूरी कदम जवाबदेही की स्पष्ट रेखा खींचने का है। किसी भी क्षेत्र में अवैध खनन होने पर संबंधित जिले के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो। वहीं तकनीक का इस्तेमाल निगरानी के लिए किया जाए। ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट इमेजिंग और जीपीएस ट्रैकिंग जैसे उपाय अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुके हैं। इसके साथ ही खनन नीति में पारदर्शिता और सख्ती दोनों जरूरी हैं। सुप्रीम कोर्ट को भी ऐसी सख्ती दिखानी चाहिए जिसमें अफसरों के लिए लापरवाही की कोई गुंजाइश न हो। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब पुलों के नीचे की रेत खिसकती है, तो केवल ढांचा नहीं, भरोसा भी हिलता है।
Updated on:
15 Apr 2026 03:19 pm
Published on:
15 Apr 2026 03:16 pm
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